WEEKLY POST: लक्ष्य BPSC – भाग 5

 

पिछले दो आलेख में साक्षात्कार से जुड़े अनुभवों को साझा किया था | आज जब इस आलेख को लिख रहा हूँ तो आयोग 66वीं BPSC के मुख्य परीक्षा कार्यक्रम की तिथी की घोषणा कर चुकी है जो कि जुलाई के अंतिम दिनों में संपन्न होगी| कुल मिलाकर 67वीं BPSC की नोटिफिकेशन कभी भी आ सकती है और मान कर चलें कि 67वीं BPSC की परीक्षा अक्टूबर 2021 में ही होगी|

मुख्य परीक्षा में भारत का आधुनिक इतिहास एवं भारतीय संस्कृति से सम्बन्धित प्रश्न सामान्य अध्ययन के प्रथम प्रश्नपत्र के प्रथम भाग में होता है| इसमें दिए गए विकल्पों में से तीन प्रश्नों के उत्तर लिखने होते हैं| जिसके कुल प्राप्तांक 114 होता है-प्रत्येक 38 अंक का |

इन प्रश्नों के लिए आपकी रणनीति चयनात्मक(Selective) हो सकती है और यदि आप इस ब्लॉग पर नियमित अंतराल पर आते रहेंगें तो इस भाग की सम्पूर्ण तैयारी यहीं से पूरी हो सकती है| अभी ब्लॉग पर चम्पारण सत्याग्रह से संबंधित आलेख उपलब्ध है आप उसे पढ़ सकते हैं| इसमें मैं प्रयास करूँगा कि संबंधित आलेख से अब तक पूछे गये सभी प्रश्नों को एक साथ यहाँ रख दूँ जिससे आप समझ सकें कि आलेख से संबंधित प्रश्नों के आयाम क्या – क्या हो सकते हैं|

इस आलेख में मैं ‘1857 के विद्रोह’ से संबंधित प्रश्नों को रखता हूँ साथ ही ‘1857 के विद्रोह’ से संबंधित तथ्यों को रखूँगा|

1857 के विद्रोह से संबंधित पूछे गए प्रश्न :

  1. 1. 1857 के विद्रोह के क्या कारण थे? बिहार में उसका प्रभाव क्या था? (65वीं BPSC/2020)
  2. 2. सन् 1857 के विद्रोह में बिहार के योगदान की विवेचना कीजिये (63वीं BPSC/2019)
  3. 3. बिहार के विशेष संदर्भ में 1857 की क्रांति के महत्व को आलोचनात्मक विवेचना कीजिए।( 56-59वीं BPSC/2016)
  4. 4. 1857 की क्रांति में कुंवर सिंह के योगदान का आलोचनात्मक परीक्षण कीजिए। (53-55वीं BPSC/2012)
  5. 5. बिहार में 1857 के विद्रोह के उद्भव के कारणों की विवेचना करें तथा उसकी असफलता का उल्लेख करें। (47वीं BPSC/2007)
  6. 6. 1857 के विद्रोह में कुंवर सिंह की भूमिका का मूल्यांकन करें। (43वीं BPSC/2001)
  7. 7. इस निष्कर्ष का निवारण कठिन है कि 1857 का तथाकथित प्रथम राष्ट्रीय संग्राम न तो प्रथम है न राष्ट्रीय और न स्वतंत्रता संग्राम ही।” समीक्षा करें। (41वीं BPSC/1997)

1857 का महाविद्रोह

प्रकृति अथवा स्वरूप:

1857 के महाविद्रोह के स्वरूप निर्धारण में आरंभ से ही एक विवाद रहा है और इसका कारण रहा है इस  महाविद्रोह पर निष्पक्ष इतिहास लेखन के अभाव का । हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि आरंभ में अध्ययन शोध के रुप में केवल सरकारी अभिलेखागार ही उपलब्ध था क्योंकि विद्रोही पकड़े जाने के डर से अपने महत्वपूर्ण दस्तावेज पहले ही जला चुके थे।

अतः आरंभ में ब्रिटिश वि़द्वानों ने इस महाविद्रोह के महत्व को कम करने के लिए इसे कई नाम दिए। जैसे सिपाही विद्रोह, मुस्लिम षडयंत्र का परिणाम तथा सभ्यता एवं बर्बरता के बीच का संघर्ष किंतु परवर्ती काल के शोधों में इस धारणा को अस्वीकृत कर दिया कि इसे सिपाही विद्रोह करार देना सर्वथा अनुचित था यद्यपि यह सही है कि बंगाल सेना के 1,20,000 जवान (सिपाही) ब्रिटिश के विरुद्ध हथियार लेकर खड़े थे और निश्चिय ही यह किसी भी साम्राज्यवादी सत्ता के विरुद्ध सबसे बड़ा सैनिक विद्रोह था, किंतु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि इन सैनिकों के पीछे लाखों लोग  खड़े थे|

जहां तक मुस्लिम षडयंत्र का नाम देने का सवाल है तो हमें यह स्मरण होना चाहिए कि इसमें हिंदुओं की भी बड़ी भागीदारी रही थी एवं मुगल बादशाह बहादुरशाह जफर महज हिंदुस्तान की एकता के प्रतीक था। उसी प्रकार इसे सभ्यता और बर्बरता के बीच के संघर्ष का नाम देना उचित नहीं क्योंकि अगर इस व्रिदोह के  मध्य विद्रोहियों ने बर्बरता दिखाई थी तो उससे कहीं अधिक बर्बरता स्वयं ब्रिटिश ने भी दिखाई थी। इस विद्रोह के दमन के मध्य ब्रिटिश ने अभूतपूर्व क्रूरता का परिचय दिया था।

आगामी डेढ शताब्दी तक इस विद्रोह के स्वरूप के विषय में निरंतर बहस चलता रहा किंतु इसमें कोई निश्चित अवधारणा स्थापित नहीं हो सकी। किंतु हाल में इस महाविद्रोह के स्वरूप पर जो नए शोध हुए हैं उनसे यह सिद्ध होता है कि यह महज एक विद्रोह नहीं अपितु भारत का प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन था | नवीन अध्ययन सामग्री के रूप में दिल्ली अखबार सरकार से निकलने वाला गजट तथा भोजपुरी साहित्य को आधार बनाया गया। वस्तुतः विश्लेषण करने पर यह ज्ञात होता है, इसका भौगोलिक विस्तार जो हमें ज्ञात है उससे कहीं अधिक था। दक्षिण भारत में इसका साक्ष्य कर्नाटक एवं मालाबार क्षेत्र तक मिला है।

इसमें लोगों की भी व्यापक भागीदारी रही अर्थात किसान, श्रमिक, शिलपी, कारीगर, जनजातीय लोग सबों ने इसमें भागीदारी निभाई थी फिर विभिन्न क्षेत्र की घटनाओं में भी एक प्रकार आंतरिक जुड़ाव दिखता है| एक क्षेत्र की घटना दूसरे क्षेत्र की घटना को प्रभावित कर रही थी तथा एक नेता की अपील दूसरे क्षेत्र के लोगों तक पहुंच रही थी।

उर्पयुक्त तथ्यों के आधार पर हम इस निष्कर्ष पर पहुंचते है कि 1857 का विद्रोह एक विद्रोह न होकर प्रथम राष्ट्रीय आंदोलन था। और अगर यह आधुनिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति नहीं तो कम से कम भारत के आरंभिक राष्ट्रवाद की अभिव्यक्ति अवश्य था।

महाविद्रोह के कारण :

  1. मुक्त व्यापार की नीति (1813)
  2. हस्तशिल उद्योगों का पतन तथा शिल्पी बेरोजगारी
  3. भारत का विकास ब्रिटिश वस्तुओं के लिए करने हेतु सामाजिक सुधार
  4. ब्रिटिश के द्वारा साक्षर सैनिकों की नियुक्ति पर बल एवं ब्रिटिश साम्राज्य की सेना की महत्वपूर्ण भाग बंगाल सेना थी किंतु सैनिकों में नस्लवादी भेदभाव की नीति से असंतोष था।
  5. साम्राज्यवादी प्रसार पर बल अतः शासन एवं उसके अधिकारी बेरोजगार एवं विस्थापित
  6. मुक्त व्यापार की मांग थी कि अधिक से अधिक क्षेत्रों को प्रत्यक्ष ब्रिटिश नियंत्रण में ले लिया जाए। स्वाभाविक रूप से साम्राज्यवाद प्रसार पर बल दिया गया। फिर प्रत्येक साम्राज्यवादी विस्तार का अर्थ था शासक एवं उनके अधिकारियों का विस्थापन। अतः इन तत्वों के द्वारा 1857 के महाविद्रोह में भूमिका निभाई गई।
  7. मुक्त व्यापार की नीति ने भारतीय हस्तशिल्प उद्योगों को गहरा धक्का पहुंचाया| अतः बड़ी संख्या में शिल्पी बेरोजगार हुए यही वजह है कि 1857 के महाविद्रोह में शिल्पीयों की भी बड़ी भूमिका रही थी।
  8. मुक्त व्यापार की नीति का उद्देश्य भारत का विकास ब्रिटिश वस्तुओं के बाजार के रूप में करने पर रहा था। भारत ब्रिटिश वस्तुओं का प्रभावी बाजार बने इसलिए भारतीय समय को परंपरागत ढांचे से बाहर निकलना आवश्यक था। यह एक महत्वपूर्ण कारण था कि इस काल में समाज सुधार के लिए इतने सारे कानून क्यों बनाया गया था किंतु सामाजिक-संस्कृति मामले में ब्रिटिश शक्ति के हस्तक्षेप ने भारतीय के मन में एक प्रतिक्रिया को जन्म दिया और अनेक भारतीय अपने दीन और धर्म की रखा के लिए खड़े हो गए।
  9. ब्रिटिश की साम्राज्यवादी महत्वकांखा को पूरा करने में बंगाल सेना ने अहम भूमिका निभाई थी। उन्होंने भारत के अंदर ही नहीं अपितु भारत से बाहर भी ब्रिटिश सत्ता के विस्तार के लिए निरंतर काम किया था। इसलिए माना जाता है कि बंगाल नेपोलियन की सेना के बाद विश्व की सबसे व्यस्त सेना रही थी किंतु बंगाल सैनिकों को इस बात का आक्रोश था कि उसके साथ नस्लवादी भेद-भाव किया जा रहा था| इसके साथ ही 19वीं सदी के आरंभिक दशकों तक ब्रिटिश साम्राज्य के द्वारा सार्वभौमिक सैनिक नियम लागू किए जा रहे थे। इस कारण से बंगाल सेना के सैनिकों के लिए अपने धार्मिक प्रतीकों को बचाए रखना मुश्किल हो गया था।
  10. सैनिक ढांचे के निर्माण में ब्रिटिश का जोर बस साक्षर सैनिकों की नियुक्ति पर रहा था और चूंकि साक्षर सैनिक सवर्ण समूह (उच्च वर्ग) में ही उपलब्ध थे इसलिए बंगाल सेना में उत्तरी बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश के उच्च जाति समूहों से सैनिकों की नियुक्ति की गई थी। इसलिए बंगाल सेना में एक जाति संवेदशनशीलता आ गई थी।

महाविद्रोह के विफलता के कारण:

  1. एक स्पष्ट्रवादी कार्यक्रम का अभाव
  2. विभिन्न क्षेत्र के नेताओं के बीच आपसी ताल-मेल का अभाव
  3. अनेक राजाओं और कुलीनों ने इसमें भाग नहीं लिया, इतना ही नहीं उन्होंने विद्रोह को दबाने में ब्रिटिश का साथ दिया।
  4. नवोदित भारतीय मध्य वर्ग ने भी इस विद्रोह में हिस्सा नहीं लिया तथा उनकी सहानुभूति ब्रिटिश राज के पक्ष में नहीं रही। ब्रिटिश के पास बेहतर हथियार और सफल अधिकारी थे। महत्वपूर्ण ब्रिटिश अधिकारी में नील हैवलोक, हडसन, ह्यूरोज आदि ने इस महाविद्रोह को दबाने में अहम भूमिका निभाई।
  5. अंतर्राष्ट्रीय परिस्थितियां भी ब्रिटिश के पक्ष में थी क्योंकि इस व्रिदोह से थोड़ा पूर्व ही यूरोप में क्रिमीया का युद्ध समाप्त हो चुका था तथा ब्रिटिश सेना वापस लौट चुकी थी।
  6. इसमें सैनिकों का अंधविश्वास भी एक कारण बना। जैसा कि हम जानते है 1857 में धुमकेतु प्रकट हुआ था। बंगाल के सिपाही ने उसे उपयुक्त सूचक मान लिया तथा उसका उत्साह ठंडा पड़ गया।

महाविद्रोह का महत्व :

  1. भले ही महाविद्रोह को तात्कालिक रूप से कुचल दिया गया किंतु भविष्य के संदर्भ में इसका व्यापक महत्व है। किसी आलोचक ने सच ही कहा है कि मृत सीजर, जीवित सीजर से अधिक ताकतवर सिद्ध हुआ। यह बात 1857 के महाविद्रोह पर भी लागू होती है।

 

  1. वस्तुतः भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन के मध्य अनेक बार इसे उद्धृत किया गया तथा यह राष्ट्रवाद को प्रेरित करने में अहम योगदान दिया। एक ब्रिटिश विद्वान स्वीमर ने भी कहा है कि सिपाही की गालियों की तुलना में बहादुरशाह जफर के गजल ज्यादा धातक सिद्ध हुए।
  2. 20वीं सदी के आरंभ में महान क्रांतिकारी वी.डी.सावकर ने भारत में राष्ट्रीय आंदोलन को प्रोत्साहन देने के लिए इस महाविद्रोह को उद्धृत किया फिर आगे 1942 के भारत छोड़ो आंदोलन के समय भी भारत के प्रथम स्वतंत्रता आंदोलन को याद किया गया।

1857 के महाविद्रोह से संबंधित उपर्युक्त तथ्यों को रखने का उद्देश्य यह है कि आप इससे परिचित हो जाएँ फिर इससे संबंधित जितने भी प्रश्न BPSC  में पूछे जाते हैं वो अमूमन बिहार के सन्दर्भ में और बाबू वीर कुँवर सिंह से संबंधित होते हैं| अतः उसकी विशेष चर्चा अगले आलेख में की जाएगी| 

क्षमाप्राथी हूँ कि पिछले सप्ताह की भागम-दौड़ की वजह से आलेख आप तक नहीं पहुंच पाया इसलिए इस सप्ताह आप तक दो WEEKLY POST पहुंचेगा|

अब अगले आलेख में – (खुश रहें – स्वस्थ रहें)

(कुँवर आईंस्टीन)