WEEKLY POST: लक्ष्य BPSC – भाग 7

पिछले आलेख में सामान्य अध्ययन – प्रश्नपत्र -1 से संबंधित प्रश्नों के वारे में चर्चा की गई थी साथ ही संबंधित तथ्यों को भी आपके समक्ष रखा गया था जिसमें बाबू वीर कुँवर सिंह की 1857 के विद्रोह में भूमिका से संबंधित तथ्यों की व्याख्या की गई थी| इस आलेख में सामान्य अध्ययन – प्रश्नपत्र -2 के भाग क से संबंधित भारतीय राजनीती एवं शासन वाले विषय से संबंधित प्रश्नों में से महत्वपूर्ण ‘न्यायिक समीक्षा’ एवंन्यायिक सक्रियतावाद’ से संबंधित प्रश्नों को रखता हूँ फिर उससे संबंधित तथ्यों की व्याख्या करूँगा| इसे पढने के वाद आप इन प्रश्नों के उत्तर लिखने में खुद को सक्षम महसूस पायेंगें साथ ही इस विषय से संबंधित आपके दृष्टिकोण में भी नए आयाम जुड़ेंगे|

  1. “भारतीय शासन में न्यायिक सक्रियता एक नवीन धारणा है।” विवेचना कीजिए तथा न्यायिक सक्रियता के पक्ष और विपक्ष में दिए गए मुख्य तर्कों को स्पष्ट कीजिये। (64वीं – BPSC2019)
  2. “न्यायिक समीक्षा” से आपका क्या अभिप्राय है? भारत के उच्चतम न्यायालय द्वारा प्रतिपादित मूल ढाँचे’ के सिद्धांत की आलोचनात्मक वर्णन कीजिए। (56-59वीं BPSC/2016)
  3. न्यायिक सक्रियतावाद” – अर्थ एव मूल्यांकन – (टिप्पणी – 200 शब्दों में) (45वीं – BPSC/2002)
  4. न्यायिक सक्रियता एक संसदीय लोकतंत्र में दुधारी तलवार है”- (टिप्पणी-200 शब्दों में) (42वीं BPSC /1999)

न्यायिक समीक्षा एवं न्यायिक सक्रियतावाद

सरकार के तीनों भाग विधायिका, कार्यपालिका एवं न्यायपालिका को शक्ति भारतीय संविधान से प्राप्त होती है| भारतीय संविधान में सरकार के संसदीय स्वरुप की व्यवस्था लोकतान्त्रिक प्रणाली के अंतर्गत की गई है| संसदीय शासन प्रणाली में विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्य एवं उत्तरदायित्व परस्पर व्यापित(मिले हुए) होते  हैं|

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 75(3) में मंत्री परिषद को सामूहिक रूप से लोक सभा के प्रति जवाबदेह बनाया गया है | अतः भारतीय शासन का नेतृत्व (चुनी हुई सरकार) राजनीतिक कार्यपालिका को दिया गया है| संसदीय शासन प्रणाली में संसद में बहुमत प्राप्त राजनीतिक दल या राजनीतिक दलों के गठबंधन  को सरकार बनाने का अवसर मिलता है| विधायिका का कार्यपालिका पे नियंत्रण हेतु  कई संवैधानिक प्रावधान किया गया है परंतु शासन के संसदीय स्वरुप के कारण विधायिका का कार्यपालिका पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पाता है साथ ही यह विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच के अवरोध एवं संतुलन को भारतीय संविधान के उद्देशियका में वर्णित उद्देश्यों के अनुरूप प्राप्त नहीं कर पाता है|

संसदीय शासन प्रणाली में विधायिका एवं कार्यपालिका के बीच केअवरोध एवं संतुलन’ की कमजोर कड़ी को संविधान के अनुच्छेद 13(2) में वर्णित प्रावधान ने एक सीमा तक दुरुस्त किया है| इसने न्यायपालिका को यह शक्ति प्रदान की है कि वह विधायिका एवँ कार्यपालिका के कार्यों का इस अनुच्छेद में  वर्णित सीमाओं के तहत समीक्षा करे एवं यदि इस अनुच्छेद में वर्णित प्रावधान का उल्लंघन हो रहा है तो उसे उल्लंघन की मात्रा तक  शुन्य घोषित कर सके| न्यायपालिका की इसी शक्ति कोन्यायिक समीक्षा’ के रूप में जाना जाता है| ‘न्यायिक समीक्षा’ शब्द की अमेरिकी संविधान में स्पष्ट रूप से चर्चा की गई है परंतु भारतीय संविधान में यह अनुछेद 13 की भावनाओं में निहित है|

न्यायिक सक्रियतावाद का आधार न्यायिक समीक्षा या एक विशेष न्यायिक निर्णय का वर्णन होता है, जिसमें एक न्यायाधीश को आमतौर पर संवैधानिक मुद्दों पर निर्णय लेने और विधायी या कार्यकारी कार्यों को अमान्य घोषित किये जाने के लिए तैयार माना जाता है|  न्यायाधीश अन्य सरकारी अधिकारियों या पूर्व की अदालतों के विचारों का हवाला देने के बजाय संवैधानिक आवश्यकताओं के अपने विचारों को लागू करते हैं। भारत में राष्ट्रीय न्यायिक नियुक्ति आयोग अधिनियम, 2014 को सर्वोच्च न्यायालय के द्वारा असंवैधानिक घोषित कर दिया गया एवं इसके लिए तर्क यह दिया गया कि इससे न्यायपालिका की स्वतंत्रता प्रभावित होगी जो की संविधान की मूल ढांचा है|           

हाल ही में न्यायपालिका ने स्वतः संज्ञान लेते हुए केरल सरकार को फटकार लगाई कि महामारी की दशा में बकरीद के लिए कोविड हेतु मानकीकृत दिशा-निर्देशों में छूट दिया जाना तर्कसंगत नहीं था और ऐसा किया जाना नागरिकों को उसे अनुच्छेद 21 से प्राप्त जीवन जीने के अधिकार से वंचित किया जाना है| हालाँकि केरल सरकार ने न्यायालय के समक्ष यह तर्क दिया कि धार्मिक समूहों के दवाब में अनुच्छेद 25 में वर्णित धर्म के अधिकारों के तहत ही ऐसा किया गया तो न्यायालय का तर्क था कि अनुच्छेद 25 का क्रियान्वयन अनुच्छेद 21 के अधीन किया जाना है |

न्यायिक सक्रियता के सन्दर्भ में एक और बात कही जाती है कि सरकार के शेष दो अंग विधायिका एवं कार्यपालिका अपने दायित्त्वों का निर्वहन उस अनुरूप में नहीं कर पाते हैं जैसी अपेक्षा उनसे संविधान के वर्णित अनुच्छेदों में की गई है| जबकि न्यायपालिका उसके वनिस्पत अपने कर्तव्यों के निर्वहन में सजग है| इसीलिए न्यायपालिका की वर्तमान कार्य पद्धति को न्यायिक सक्रियता के रूप में देखा जाता है |

न्यायिक सक्रियता के बारे में शिकायतें अधिकांश देशों में उत्पन्न हुई हैं जहां अदालतें महत्वपूर्ण न्यायिक समीक्षा का उपयोग करती हैं, विशेष रूप से सामान्य कानून प्रणालियों (जैसे, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा और भारत में संघीय स्तर पर)। न्यायिक सक्रियतावाद के कारण कभी-कभी संविधान के द्वारा प्रदत शक्तियों के पृथ्क्करण के सिद्धांत का उल्लंघन होता है| संविधान ने सरकार के तीनों भागों के बीच शक्तियों के पृथ्क्करण एवं  अवरोध एवं संतुलन’ की प्रकिया का भी निर्धारण किया है परंतु आवश्यकता इसके ईमानदार क्रियान्वयन की है|

वर्तमान में सरकार के तीनों भागों में से न्यायपालिका के प्रति आम जनमानस का भरोसा एवं विश्वास सबसे अधिक है अतः न्यायपालिका की स्वतः संज्ञान  संसदीय शासन प्रणाली  की आलोचनात्मक पक्ष को सकारात्मक रूप से प्रभावित कर संविधान के शक्तियों के पृथ्क्करणके सिद्धांत का पालन करते हुए अवरोध एवं संतुलन’ के सिद्धांत के उद्देयेश्यों को पूरा करेगी|

न्यायपालिका को संविधान की संरक्षक मानी जाती है अतः उससे अपेक्षा की जाती है कि वह विधायिका एवं कार्यपालिका के कार्यों की संवैधानिकता की समीक्षा करती रहे और  आवश्यकता पड़ने पर विधायिका एवं कार्यपालिका  का मार्गदर्शन करते रहे साथ ही स्वयं भी संवैधानिक सीमाओं के  अंदर रह कर अपने कर्तब्यों का  निर्वहन करे|

उम्मीद करता हूँ की आप इसमें दिए गए प्रश्नों के उत्तर लिखने का प्रयास करेंगे| एक बात याद रखिए की सिर्फ पढ़ लेने से कुछ भी नहीं होगा सफलता तभी सुनिश्चित हो पायेगी जब आप विषय को पढेंगें – सोचेंगे – लिखेंगे| तीनों संतुलित रूप से चलते रहना चाहिए| अगले आलेख में सामन्य अध्ययन प्रश्न पत्र -2 के भाग ख से संबंधित विषय और प्रश्नों के चर्चा करेंगें|

अब अगले आलेख में – (खुश रहें – स्वस्थ रहें)

(कुँवर आईंस्टीन)