काइटेक्स की कहानी में समझने योग्य सूत्र

परिधान निर्माता के निवेश स्थानांतरण की गाथा पूंजीवाद और लोकतंत्र के बीच सौदेबाजी की ओर इशारा करती है।

हाल ही में, जब कपड़ा निर्माता काइटेक्स समूह ने घोषणा की कि वह अपने गृह राज्य केरल में नए निवेश करने की अपनी योजनाओं पर पुनर्विचार कर रहा है, तो 9 अन्य राज्य इसे अपने पक्ष में करने के लिए प्रतिस्पर्धा करने लगे। उन्होंने इसे वित्तीय प्रोत्साहन और अन्य छूटों की पेशकश की। कंपनी ने इसमें तेलंगाना को चुना, जिसने न केवल इसे “सर्वश्रेष्ठ सौदे” की पेशकश की थी, बल्कि कंपनी के नेताओं को हैदराबाद की यात्रा करने और उद्योग मंत्री से मिलने के लिए विमान भी भेजा था। केरल का अक्सर विषाक्त ट्रेड यूनियनवाद राज्य की औद्योगिक महत्वाकांक्षाओं को पटरी से उतारने का प्रमुख कारक रहा है। लेकिन केरल के औद्योगिक माहौल से परे, काइटेक्स प्रकरण पूंजीवाद और लोकतंत्र के बीच चल रहे वैश्विक सौदे को दर्शाता है।

निहित मुख्य सवाल

अग्रणी औद्योगिक समाज इस प्रश्न से जूझ रहे हैं, और G7 देशों ने निगमों पर वैश्विक न्यूनतम कर की ओर बढ़ने की पहल की है और कंपनियों को हेडक्वाटर्स के विपरीत जहाँ संचालित होते हैं वहां अधिक करों का भुगतान करने के लिए बाध्य किया है। बहस के केंद्र में दो सवाल हैं। पहला, एक पूंजीवादी उद्यम अपने अवस्थिति वाले स्थान पर राजनीतिक और सामाजिक संगठन से कैसे संबंधित होता है? दूसरा, निवेश के लिए विभिन्न क्षेत्राधिकार कैसे प्रतिस्पर्धा करते हैं, और वो भी किस सामाजिक कीमत पर? अब, इन सवालों के संदर्भ में काइटेक्स कहानी का एक संक्षिप्त विवरण देखते हैं।

काइटेक्स समूह मुख्य रूप से निर्यात-उन्मुख है और अमेरिकी खुदरा बाज़ार के दिग्गज वॉलमार्ट को इसके वैश्विक ग्राहकों में गिना जाता है। कोच्चि के पास किझाक्कम्बलम पंचायत में स्थित, कंपनी लगभग 10,000 लोगों को रोजगार देती है, जिनमें से अधिकांश केरल के बाहर के हैं। 2015 में, कंपनी की कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी गतिविधियों ने एक राजनीतिक रूप ले लिया। इसने बैनर ‘ट्वेंटी20’ किझाक्कम्बलम के तहत, स्थानीय निकाय चुनावों में सनसनीखेज कदम उठाते हुए उम्मीदवारों को मैदान में उतारा था। इसने 19 में से 17 सीटों पर जीत हासिल की और पंचायत में बहुमत हासिल किया था। 2020 के स्थानीय निकाय चुनावों में, इसने तीन और पंचायतों की सत्ता पर कब्जा जमा लिया। 2021 के केरल विधानसभा चुनावों में, ‘ट्वेंटी 20’ ने आठ क्षेत्रों में उम्मीदवार खड़े किए और अच्छा प्रदर्शन किया, हालांकि जीत कोई भी नहीं सका। साथ ही, 2020 में, समूह ने राज्य में ₹3,500 करोड़ के नए निवेश की घोषणा की।

मई में विधानसभा के नतीजों के बाद हालात अचानक बदल गए; कंपनी ने कहा कि जून के महीने में उसके संचालन जगहों पर जो 11 निरीक्षण किए, वह उत्पीड़न के अलावा और कुछ नहीं थे। हालाँकि, सरकार ने इस पर कहा कि ये निरीक्षण मानव और श्रम अधिकारों के उल्लंघन के संबंध में विशिष्ट शिकायतों के जवाब में थे। इस सब के अंत में, कंपनी के चेयरमैन ने केरल में निवेश के माहौल को लताड़ा और तेलंगाना जाने के अपने निर्णय की घोषणा की।

सामाजिक नियंत्रण का समझौता

श्रम संबंधों, पर्यावरण, और प्राकृतिक संसाधनों और करों को कवर करने वाले नियम निजी उद्यमों पर सामाजिक नियंत्रण के कॉम्पैक्ट को बनाते हैं। पूंजीवाद और लोकतंत्र के बीच सामाजिक समझौता निर्वाचित प्रतिनिधियों और नौकरशाहों के माध्यम से किया जाता है। यह वार्ता व्यवहार में कानूनी और अवैध एवं औपचारिक और अनौपचारिक माध्यमों से निकली है। नियम तो हैं, लेकिन रिश्वत और राजनीतिक चंदे भी इसके एक हिस्से हैं। उन स्थानों पर जहां लोकतंत्र बिखरा हुआ है और राजनीतिक कार्रवाई बहुस्तरीय है, ऐसी बातचीत अधिक जटिल हो जाती है। उदाहरण के लिए, केरल में, यहां तक ​​​​कि मुख्यमंत्री भी वह सब कुछ लागू करने में असमर्थ हैं, जिसे वह उचित समझते हैं; यह एक ऐसा बिंदु है जिसे काइटेक्स के अध्यक्ष ने बार-बार कहा है। ये वो भी उस जगह पर है जहां मुख्य कार्यकारी के पास अदम्य शक्ति है कि सभी निर्णय ‘एकल खिड़की’ पर होते हैं।

इन सभी विचारों के आधार पर, निवेशक को दो स्तरों पर अपने निर्णय लेने होते हैं – पूंजी कहाँ लगायें और वहां के सामाजिक और राजनीतिक मुद्दों से कैसे निपटना है। जब अमेरिकी राज्यों ने निवेशकों को आकर्षित करने के लिए एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करना शुरू किया, तब 20 वीं शताब्दी की शुरुआत में ‘रेसटो-द-बॉटम’ वाक्यांश उपयोग में आया, जो पूंजी को खुश करने के लिए प्रतिस्पर्धा को दर्शाता है, और पर्यावरण और श्रम जैसे अन्य कारकों की अनदेखी करता है। सदी के अंत में यह दौड़ वैश्विक हो गई। देशों और देशों के क्षेत्राधिकारों को एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। 2015 में, भारत ने वैश्विक रैंकिंग मॉडल का अनुसरण करते हुए, राज्यों की ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग शुरू करने के लिए विश्व बैंक के साथ भागीदारी की।

किसी राज्य की निवेशक सहूलियतता अक्सर श्रम, पर्यावरण और स्वदेशी आबादी के हितों को खत्म करने की उसकी इच्छा और क्षमता तक कम हो जाती है। कर रियायतें राज्य की क्षमता को कैसे प्रभावित करती हैं यह एक जुड़ा हुआ प्रश्न है। अधिकांश कराधान शक्तियों को खोने वाले राज्यों के साथ, कर रियायतें एक व्यवहार्य आकर्षण नहीं रहे कि वे और अधिक पेशकश कर सके। ईज ऑफ डूइंग बिजनेस रैंकिंग में झारखंड पांचवें स्थान पर है; केरल 28 वें स्थान पर है (https://bit.ly/3hQRTF5)झारखंड की पिछली सरकार ने पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों में विस्तार) अधिनियम (PESA) और वन अधिकार अधिनियम (FRA) के तहत कानूनी रूप से गारंटीकृत अधिकारों का दावा करने वाले 3,000 आदिवासियों को जेल में डाल दिया था। उनके कानूनी अधिकारों के लिए लड़ाई ने जेसुइट पुजारी फादर स्टेन स्वामी को हाल ही में 84 वर्ष की आयु में कारावास और हिरासत में मौत तक पहुंचा दिया। सतत विकास लक्ष्य सूचकांक 2019-20 में गरीबी स्कोर कार्ड (100 में से) में झारखंड का 28 है, जबकि केरल का 64 है।

अमेरिकी उदाहरण

वैश्वीकरण के उदय से पहले, पूंजीपतिओं को अपने आधार पर राजनीतिक व्यवस्था के साथ बातचीत करनी पड़ती थी। अमेरिकी लोकतंत्र में निगमों का प्रभाव एक विवादास्पद विषय बना हुआ है। 2010 में, यू.एस. सुप्रीम कोर्ट ने निगमों और अरबपतियों द्वारा असीमित चुनावी खर्च की अनुमति दी। वे विशेष कारणों और व्यक्तित्वों को बढ़ावा देते हैं या कमजोर करते हैं। काइटेक्स समूह ने इस मॉडल को एक कदम और आगे बढ़ाया और चार पंचायतों में सीधे तौर पर राजनीतिक सत्ता पर कब्जा कर लिया, भले ही इसके खिलाफ प्रदूषण फ़ैलाने की शिकायतें बढ़ रहीं थी। ये यहीं नहीं रुके, बल्कि इसके अध्यक्ष ने प्रस्ताव दिया कि बड़ी कंपनियों को उनके मॉडल का पालन करना चाहिए और देश भर में राजनीतिक प्रशासन संभालना चाहिए। लेकिन चार पंचायतों को नियंत्रित करने का मतलब व्यापक राजनीतिक व्यवस्था पर नियंत्रण नहीं था। इसलिए, स्थानांतरण किया गया।

वैश्वीकरण की कहानी बहुत अधिक लोकतंत्र की बेड़ियों से भागने के लिए पूंजी की बढ़ी हुई क्षमता की कहानी है जो एक मजबूत शासन के तहत अच्छी तरह से नियंत्रित हो, और जहां सभी मंजूरी एक ‘एकल खिड़की’ पर उपलब्ध हों। निवेश उन जगहों पर ले जाया गया जहां पर्यावरण के नियम ढीले हैं, मजदूरी कम है, श्रम मानक कमजोर हैं, और असहमति का जवाब लोहे की मुट्ठी से दिया जाता है। यह तब तक पूरी तरह से काम कर रहा था जब तक कि इसका प्रभाव पश्चिमी लोकतंत्रों के तटों तक नहीं पहुंच गया। अब पश्चिम इस चुनौती के प्रति जाग रहा है और G-7 का कदम इस संकट की स्वीकृति है। ट्रेजरी के अमेरिकी सचिव जेनेट एल येलेन अब “मजदूर वर्ग” के बारे में बात करते हैं। “यह वैश्विक न्यूनतम कर कॉर्पोरेट कराधान में दौड़ को नीचे स्तर तक समाप्त कर देगा, और अमेरिका और दुनिया भर में मध्यम वर्ग और कामकाजी लोगों के लिए निष्पक्षता सुनिश्चित करेगा,” उन्होंने हाल ही में कहा। वे आगे कहते हैं कि यह “देशों को सकारात्मक आधारों पर प्रतिस्पर्धा करने के लिए प्रोत्साहित करेगा, जैसे कि हमारे कार्यबलों को शिक्षित और प्रशिक्षित करना और अनुसंधान और विकास और बुनियादी ढांचे में निवेश करना।”

राष्ट्रीय मानक की आवश्यकता

निवेश के प्रति अपनी कथित शत्रुता और पूंजी के अवसरवाद का महिमामंडन करने के लिए केरल की निंदा करने के बजाय, विकास प्रक्रिया में स्वदेशी समुदायों के अधिकारों की गारंटी देने वाले कानूनों के बलपूर्वक कार्यान्वयन के साथ-साथ कॉर्पोरेट प्रशासन, पर्यावरण और श्रम के लिए एक राष्ट्रीय मानक की आवश्यकता पर चर्चा करना समय की मांग है।

यह विडंबना ही है कि भारत ऐसे समय में विकास के मार्ग के रूप में राज्यों के बीच प्रतिस्पर्धा को प्रोत्साहित कर रहा है जब सबसे उन्नत औद्योगिक समाज प्रतिस्पर्धा की सीमाओं को महसूस कर रहे हैं और श्रम, पर्यावरण और कराधान में बेहतर वैश्विक मानकों पर जोर दे रहे हैं। राज्यों की विकास आकांक्षाओं को एक आधुनिक ग्लैडीएटर खेल में बदलना शायद ही उस नारे के अनुरूप है जिसे हमें दोहराने के लिए कहा जाता है, अर्थात् वन इंडिया-एक भारत।

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