क्वाड धीरे-धीरे अपने प्रभाव को खो सकता है

वाशिंगटन डीसी में पहले समन्वित रूप से चतुर्भुज सुरक्षा वार्ता (क्वाड) शिखर सम्मेलन की पूर्व संध्या पर आ रहा, नए ऑस्ट्रेलिया-यू.के.-यू.एस. (AUKUS) त्रिपक्षीय सुरक्षा साझेदारी क्वाड को एक सूक्ष्म संदेश भेजती हुई प्रतीत होती हैः उद्देश्य को आकार दें या अप्रासंगिक हो जाएं। (AUKUS) की घोषणा और क्वाड शिखर सम्मेलन के हालिया परिणाम से संकेत मिलता है कि AUKUS इंडो-पैसिफिक क्षेत्र की एक प्रमुख सुरक्षा व्यवस्था बनाने के लिए आगे बढ़ेगा, जिससे संभावित रूप से क्वाड को निगराणी, राजनीतिक इच्छाशक्ति, और संसाधन के क्षेत्र में पीछे हटने के लिए मजबूर किया जाएगा। लेकिन इससे पहले कि हम क्वाड पर AUKUS के निहितार्थ तक पहुँचें, आइए हम संक्षेप में जाँच करें कि AUKUS क्वाड के लिए कैसे उपयोगी है।

सहयोगियों को आश्वासन

जिस तरह से संयुक्त राज्य अमेरिका ने अफगानिस्तान से अपनी सेना वापस ले ली, जिसके परिणामस्वरूप मानवीय आपदा हुई, अभी भी तीव्र अंतरराष्ट्रीय आलोचना के तहत, AUKUS अमेरिकी राष्ट्रपति जो बिडेन की अमेरिकी सहयोगियों के लिए विशेष रूप से इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में प्रतिबद्धता को स्पष्ट रूप से संकेत देना चाहता है। कुछ मायनों में, AUKUS अमेरिका की सुरक्षा प्रतिबद्धताओं के अपने सहयोगियों को आश्वस्त करने में मदद करता है और भारत-प्रशांत के लिए वाशिंगटन की धुरी को रेखांकित करता है। दूसरा, डील और विशेष रूप से ऑस्ट्रेलिया के साथ अमेरिकी परमाणु पनडुब्बी प्रौद्योगिकी को साझा करने से कैनबरा को चीन को और अधिक दृढ़ विश्वास के साथ लेने के बारे में पिछली हिचकिचाहट को दूर करने में मदद मिलेगी। तीसरा, इस बात के बावजूद कि AUKUS क्वाड के लिए खतरे की घंटी बजा सकता है, AUKUS अभी भी बड़े इंडो-पैसिफिक एजेंडे के लिए हाथ में एक शॉट है, जिसमें भारत, अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, अन्य प्रमुख भागीदार हैं। दूसरे शब्दों में, AUKUS भारत-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त, खुला और समावेशी रखने के क्वाड के घोषित उद्देश्य में मदद करेगा, जिससे इसके मूल एजेंडे में योगदान होगा।

कोई प्रतिस्थापन नहीं, लेकिन …

AUKUS क्वाड की जगह नहीं ले सकता है और फिर भी ऐसा प्रतीत होता है कि AUKUS ने उद्यम किया है, जहां क्वाड सैन्य क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए अनिच्छुक रहा है। इसके अलावा, AUKUS क्वाड की अंतर्निहित, आत्म-मुग्ध सीमाओं को भी उजागर करता है, अर्थात, इसकी अक्षमता और खुद को कोई सैन्य भूमिका देने की इच्छा की कमी। COVID-19 से लेकर जलवायु तक की चुनौतियों पर हाल ही में आयोजित वाशिंगटन शिखर सम्मेलन के फोकस से पता चलता है कि क्वाड के सुरक्षा-प्रधान मोड़ लेने की संभावना नहीं है; ठीक इसी खली जगह को AUKUS भरना चाहता है।

तब बड़ा सवाल यह है कि क्या क्वाड अपनी अहमियत खो रहा है। निश्चित रूप से, क्वाड के कोई स्पष्ट उद्देश्य प्रदान नहीं है, जिसके परिणामस्वरूप, बहुत सारे आइटम एजेंडे में शामिल हो जाते हैं। इसका न तो कोई सचिवालय है और न ही शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) जैसा कोई चार्टर, और न ही AUKUS जैसी गतिविधियों का एक स्पष्ट समूह है। क्वाड के फोकल क्षेत्रों की बढ़ती सूची के कारण यह अंततः उपयोगी विचार-विमर्श मंच के रूप में इसकी अहमियत कम कर देगी।

विडंबना यह है कि क्वाड प्लेटफॉर्म से जुड़ते समय सभी क्वाड सदस्यों के मन में चीन के साथ सुरक्षा/सैन्य विचार होते हैं, लेकिन कोई भी इसे इस तरह से तैयार करने के लिए उत्सुक नहीं दिखता है, जैसा कि शिखर सम्मेलन के संयुक्त बयान से प्रमाणित होता है (उत्तर कोरिया और म्यांमार हालांकि बयान में उल्लेख करते हैं, चीन नहीं)। क्वाड को ठीक से संस्थागत बनाने में कोई दिलचस्पी नहीं है और न ही ’क्वाड प्लस’ के उद्देश्य को उद्देश्यपूर्ण ढंग से आगे बढ़ाया गया है। मुझे इसे कुछ हद तक अलग करने देंः इंडो-पैसिफी क्षेत्र एक भव्य रणनीतिक दृष्टि बनी हुई है, AUKUS में इंडो-पैसिफिक सी में एक प्रमुख सैन्य / सुरक्षा व्यवस्था बनने की क्षमता है, और क्वाड / क्वाड प्लस बन सकता है इंडो-पैसिफिक के भीतर करोबारी बातें करने वाला स्थान (टॉक शॉप) बन गया है।

नई दिल्ली की हिचकिचाहट

नई दिल्ली ने स्टैंड लिया है कि “AUKUS और क्वाड के बीच कोई संबंध नहीं है“ जैसा कि उसने पहले तर्क दिया था कि मालाबार नौसैनिक अभ्यास और क्वाड के बीच कोई संबंध नहीं है, भले ही क्वाड सदस्यता मालाबार अभ्यास में दोहराई गई हो और AUKUS का दो-तिहाई हिस्सा क्वाड का 50 प्रतिशत है।

तकनीकी रूप से, इन मंचों के सदस्य देशों में स्पष्ट रूप से कुछ समानताएं हैं और उनकी संस्थागत संरचना एक जैसी नहीं इसलिए इन मंचों को लेकर नई दिल्ली का रुख स्पष्ट है। और फिर भी, यदि कोई इस तरह की तकनीकीताओं से परे जाता है, तो यह स्पष्ट है कि इस तरह की समुहबद्धता का कारण हिंद-प्रशांत क्षेत्र एक समान दृष्टिकोण रखना है अर्थात, इन समूहों के देशों के समक्ष चीन को लेकर एक चुनौती, और वे हिंद-प्रशांत क्षेत्र को मुक्त एवं स्वतंत्र रखना चाहते हैं। AUKUS के कारण ही आस्ट्रेलिया इस क्षेत्र में चीन की दादागिरी का मुकाबला करने में सक्षम है या फिर समूह का प्रमुख सदस्य देश यूनाइडेट किंगडम अपनी प्रभावी एवं वांछनीय भूमिका के साथ अपने विमान वाहक, एचएमएस क्वीन एलिजाबेथ उपलब्ध कराता है या फिर मालाबार सैन्य अभ्यास इस क्षेत्र में होता है, हालांकि वह तकनीकी रूप से एक दूसरे से संबंधित नहीं है फिर भी वह एक दूसरे जुड़े हुए हैं और इस स्वयंसिद्ध वास्तविकता को स्वीकार करना ही पड़ेगा।

आज इस बात में भी कोई संदेह नहीं है कि हिंद-प्रशांत क्षेत्र का भारत के लिए कई कारणों से बहुत महत्व है। एक तो अफगानिस्तान में सत्ता परिवर्तन से इस महाद्वीप में नई चुनौतियां उत्पन्न हो गई है, समुद्रीय क्षेत्र पर ध्यान देने की दृष्टि से भी यह क्षेत्र भारत के लिए महत्वपूर्ण है। दूसरे ऐसे समय में जब भारतीय उपमहाद्वीप अत्यंत दबाव का समाना कर रहा है, भारत को हिंद-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती वैश्विक रुचि से निपटने की दिशा में स्वयं को प्रस्तुत करने का यह बेहतर अववसर है। तीसरा, यह क्षेत्र में चीनी आधिपत्य को रोकने के लिए समान विचारधारा वाले राज्यों को एक साथ लाने का एक प्रमुख तरीका भी है।

इस संदर्भ में, यदि AUKUS संभावित रूप से क्वाड पर हावी हो जाता है, तो यह हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत के हितों के लिए हानिकारक होगा। अन्य क्वाड देश या तो न्यूट्रल हैं या गठबंधन भागीदार हैं; भारत नहीं। आखिरकर, क्वाड कोई ठोस उद्देश्य के लिए गठित संगठन की अपेक्षा करोबारी बाते करना का ठिकाना बनता जा रहा है। इसके अलावा, किसी भी रक्षा व्यवस्था के बिना, क्वाड को उद्देश्य पूर्ण नहीं बनाया जा सकता।

हिंद-प्रशांत क्षेत्र में संलग्नता

प्रमुख क्षेत्रीय आर्थिक ढांचे में शामिल होने के बारे में भारत की हिचकिचाहट से यह स्थिति और खराब हो गई है। उदाहरण के लिए, भारत न तो क्षेत्रीय व्यापक आर्थिक भागीदारी का सदस्य है और हिंद-प्रशांत देशों के साथ उसके व्यापारिक संबंध चीन से प्रतिद्वंदिता उत्पन्न कर सकते हैं। इसलिए, हिंद-प्रशांत क्षेत्र में हमारे कमजोर आर्थिक प्रभाव और प्रदर्शन को देखते हुए, ऐसा क्या हो सकता है, जो देश को एक सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा बनने में क्या मदद कर सकता जिससे इसकी क्षेत्रीय रक्षा/सुरक्षा चिंताओं का हित पूरा हो सके। AUKUS से पहले भी, भारत-प्रशांत क्षेत्र में भारत की वर्तमान भागीदारी न तो इसकी राष्ट्रीय सुरक्षा में योगदान देने में सक्षम थी और न ही इस क्षेत्र में अपने आर्थिक प्रभाव को बढ़ावा देने में सक्षम थी। और अब, AUKUS ने क्वाड और भारत के लिए उपलब्ध संभावित स्थान को और कम कर दिया है, ताकि क्षेत्र की सुरक्षा संरचना में एक गंभीर भूमिका निभा सके।

भारत की झिझक के स्रोत भले ही केवल नई दिल्ली ही नहीं है जो क्वाड के सुरक्षा/सैन्य क्षेत्र में कदम रखने से हिचकिचाती है, भारत क्वाड के गैर-सैन्य मुद्दों से आगे बढ़ने से हिचकिचाता रहा है। इसलिए सुरक्षा/सैन्य क्षेत्र में क्वाड के लिए एक मजबूत भूमिका के संबंध में नई दिल्ली की हिचकिचाहट के स्रोत क्या हैं? इस संबंध में दो परिकल्पनाओं को आगे बढ़ाया जा सकता है। एक, सैन्य गठबंधनों के बारे में भारत की पारंपरिक अनिच्छा और रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने की इच्छा। नई दिल्ली को डर है कि क्वाड का सैन्यीकरण उस ईर्ष्यापूर्ण संरक्षित परंपरा को पूर्ववत कर सकता है। हालांकि, क्वाड को औपचारिक सैन्य गठबंधन बनाए बिना सैन्य उपयोगिता का पता लगाना संभव है। इसके अलावा, क्वाड ढांचे के भीतर पारस्परिक रूप से लाभकारी सैन्य और सुरक्षा सहयोग की खोज करना रणनीतिक स्वायत्तता के सिद्धांतों के प्रतिकूल नहीं है। ’रणनीतिक स्वायत्तता’ का सक्रिय हिस्सा स्वायत्तता है, रणनीतिक नहीं।

दूसरी परिकल्पना घरेलू राजनीतिक विचारों से संबंधित हैः नरेंद्र मोदी सरकार क्वाड के लिए संभावित चीनी प्रतिक्रियाओं के कारण किसी भी सैन्य ओवरटोन से बचना चाहती है। याद कीजिए कि किस तरह भारत और ऑस्ट्रेलिया ने चीन के भड़कने के डर से कई सालों तक मंच पर नरमी बरती थी। लगता है ऑस्ट्रेलिया ने अपनी झिझक पर काबू पा लिया है, लेकिन क्या भारत ने ऐसा किया है? भारतीय जनता पार्टी के नेतृत्व वाली सरकार के लिए, अगले साल महत्वपूर्ण राज्य चुनावों और फिर 2024 के संसदीय चुनाव में चीन के साथ वास्तविक नियंत्रण रेखा पर कोई भी गर्मी अवांछित होगी। इसलिए, ऐसा लगता है कि यह घरेलू राजनीतिक विचारों का मामला है जो रणनीतिक आवश्यकताओं की खोज को पीछे छोड़ रहा है।