झारखंड के दर्शनीय स्थल

झारखंड राज्य के इतिहास में जितने भी राजवंश हुए, सभी ने अपनी सुरक्षा और शान के लिए किलों का निर्माण कराया। इसके साथ ही धार्मिक आस्था रखते हुए भव्य एवं विशाल मंदिरों और धर्मस्थलों का भी निर्माण कराया। इनके अतिरिक्त बाह्य शासकों ने भी यहाँ भवनों आदि का निर्माण कराया, जो समय के साथ जीर्ण हो गए और अधिकांश धूल-धूसरित हो गए। इनमें से कुछ के अवशेष मिले हैं और कुछ लुप्त हो गए हैं। किसी क्षेत्र की वास्तुकला, धार्मिकता और सुरक्षा व्यवस्था का पता इन्हीं से चलता है। झारखंड के बारे में विस्तृत रूप से जानने के लिए इनके बारे में जानना भी आवश्यक है :

नवरतनगढ़

  • दोइसा में बना यह किला नागवंशी राजाओं ने बनवाया था।
  • जब सन् 1627 में जहाँगीर की कैद से रिहा होकर राजा दुर्जन साल अपनी राजधानी कोकरह आया तो उसने सुरक्षा की दृष्टि से अपनी राजधानी को कोकरह से दोइसा स्थानांतरित कर लिया। यहीं उसने पाँच मंजिल महल का निर्माण कराया।
  • पूर्व में इस महल में पहली मंजिल पर नौ-नौ कक्ष थे, जो समय की आँधी में जीर्ण हो गए। जबकि इसकी ऊपर की दो मंजिलें। ढह गईं और अब शेष तीन मंजिलों में 27 कक्ष ही बचे हैं।
  • पूर्व-पश्चिम, उत्तर-दक्षिण में इसकी लंबाई 42 मीटर है।

इचाक का किला

मध्यकाल में रामगढ़ के राजा की राजधानी रही इचाक हजारीबाग से केवल। मील की दूरी पर है। जब सन् 1772 में अंग्रेजों ने रामगढ़ पर हमला किया, तब रामगढ़ के राजा तेज सिंह अपनी राजधानी को सुरक्षा कारणों की दृष्टि से इचाक ले गए और यहाँ तीन मंजिल महल बनाया। उचित रख-रखाव के अभाव में यह किला भी लगभग ध्वस्त हो चुका है।

राजमहल का किला

15वीं शताब्दी के अंत में जब अकबर का सेनापति मानसिंह एक अफगान विद्रोही का पीछा करते हुए सिंहभूम से होकर गुजरा, तब उस समय राजमहल को बंगाल का राजधानी बनाया गया। सन् 1660 में औरंगजेब ने इसे शाहशजा से छीन लिया और राजधाना के रूप में इसकी मान्यता खत्म कर दी। इसी राजमहल में राजा मानसिंह ने एक जामा मसजिद का निर्माण कराया था शाहशुजा ने भी यहाँ प्रसिद्ध सिंही दालान का निर्माण कराया ।

विश्रामपुर किला

  • किले का निर्माण मुगल शैली में किया गया है, जो संभव है कि चेरो-मुगल के संबंधों के समय निर्मित हुआ था। इसके निकट ही एक मंदिर भी है।
  • चेरो परंपरा के अनुसार इस किले का निर्माण कार्य लगभग नौ वर्ष तक चला था।

जगन्नाथपुर का मिट्टी का किला

यह किला पोरहट के राजा जगन्नाथ सिंह ने बनवाया था। इसके निर्माण में अधिकांशत: मिट्टी का ही प्रयोग किया गया था। इसके कारण अब इसके चिह्न मात्र ही पाए जाते हैं।

ढालभूमगढ़ किला

  • इसका निर्माण ढालभूम के राजा जगन्नाथ ढाल ने करवाया था और इसके साथ ही घाटशिला में भी एक किले का निर्माण करवाया गया।
  • सन् 1767 में जब फर्गुसन के नतृत्व में अंग्रेजों ने ढालभूम पर आक्रमण किया, तो राजा जगन्नाथ ढाल ने घाटशिला के महल को खाली करने से पहले उसमें आग लगा दी। समय के साथ ही ढालभूम का किला भी ध्वस्त हो गया।

अलीनगर का किला

  • यह त्रिभुजाकार किला रोहिलों के सरदार मुजफ्फर खाँ ने बनवाया था। इसके तीनों कोणों पर वर्गाकार विशाल प्रकोष्ठ हैं और तीनों भुजाएँ समान (18 मीटर) है।
  • इस किले को रोहिलों के किले के नाम से भी जाना जाता है।

अलीगंज का किला

इस किले का निर्माण पाकुड़ जिले में स्थित अलीगंज गाँव में किया गया था। संथाल-विद्रोह की शरुआत यहीं से हई थी। यह किला संथालों की अद्भुत वीरता एवं एकजुटता का प्रमाण माना जाता है।

अधूरा नागफनी भवन

यह भवन 17वीं शताब्दी में बनवाया गया था, लेकिन यह अपूर्ण स्थिति में है। ऐसा माना जाता है कि जिस राजा ने इसका निर्माण कार्य शुरू करवाया था, वह संभवत: इसके पूरा होने से पहले ही काल-कवलित हो गया था और बाद में फिर किसी ने इसे पूरा नहीं कराया। इस किले की पहाड़ी पर नागफनी का चित्र था, जिससे इसका यह नाम पड़ा।

शत्रु किला

यह नागवंशियों की अंतिम राजधानी रही, जहाँ नागवंशी राजाओं ने किले का निर्माण किया। नागवंशी इतिहास के अनुसार इस किले में दशहरे का भव्य आयोजन किया जाता था, जिसका सारा खर्च राजकोष वहन करता था।

चतरा किला

यह मध्यकालीन किला अब इतनी जीर्ण अवस्था में है कि पुरातत्त्व विभाग ने इसे जीर्णोद्धार के लिए अनुपयुक्त बताया है।

माँ भद्रकाली मंदिर

यह मंदिर झारखंड के प्राचीनतम मंदिरों में से एक है। इसकी स्थापना के संबंध में माना जाता है कि इस मंदिर का निर्माण 5वीं या छठी शताब्दी में हुआ। यह पाल शासकों का समय था। एक ही शिलाखंड से तराशी गई माँ भद्रकाली की प्रतिमा 4.5 फीट ऊंची और 2.5 फीट चौड़ी है। इसके बारे में अनेक शोध भी किए गए हैं, जिनसे पता चला है कि भैरवनाथ ने इसी स्थान पर घोर साधना की थी। इस मंदिर को भारत सरकार ने मान्यता दी है। इसके निकट ही एक संग्रहालय भी बनाया गया है, जिसमें प्राचीन मूर्तियाँ और उनके भानावशेष हैं।

वैद्यनाथ धाम

यह देवघर जिले में स्थित हिंदुओं के प्रमुख तीर्थस्थानों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि जब लंका के राजा रावण द्वारा भगवान् शिव को लंका विग्रहरूप में ले जाया जा रहा था, तब भगवान् शिव इस स्थान पर आकर इतने भारी हो गए कि उसे वह विग्रह यहीं छोड़ना पड़ा। केवल झारखंड ही नहीं, बूल्कि सारे भारत में इस मंदिर की मान्यता है।

पारसनाथ का मंदिर

यह जैन धर्म का प्रमुख स्थल है। जैन धर्म में यह माना जाता है कि उनके बीसवें और चौबीसवें तीर्थकर ने यहीं महासमाधि प्राप्त की। यहाँ पर जैन धर्म के दोनों संप्रदायों ने अनेक भव्य मंदिरों का निर्माण कराया है। 

विख्यात त्रिशुल टाँगीनाथ मंदिर

  • मंझगाँव की पहाड़ी पर टाँगीनाथ तीर्थस्थल स्थित है। इस पहाड़ी में एक गुफा है, झमरा टाँगी के नाम से विख्यात है, जहाँ कई मूर्तियाँ मिली हैं।
  • कलियुग को देखकर भगवान् टांगीनाथ विक्षुब्ध हो गए और गुफा के निकट ही स्थित चंदन के वृक्ष में समा गए।

महामाया मंदिर

  • महामाया मंदिर का निर्माण नागवंशी राजा गजघंट ने कराया था। इस मंदिर के प्रथम पुरोहित द्विजहरिनाथ थे।
  • इस मंदिर की स्थापना अभिलेख के अनुसार, 965 संवत् अर्थात् 906 ई. में की गई थी।
  • अभिलेख पर वर्णित अंकों के अनुसार, 1458 ई. में नागवंशी महाराजा शिवदास कर्ण ने महामाया मंदिर में शेषशय्या पर विराजमान विष्णु की मूर्ति की स्थापना की थी।

बेनी सागर का मंदिर

  • बेनी सागर मंदिर पश्चिमी सिंहभूम के अंतिम छोर पर उडीसा राज्य के क्योंझर से 12 कि.मी. दूर स्थित कोचांग नामक स्थान पर स्थित है।
  • पौराणिक कथाओं के अनुसार, बेनी सागर का शिव मंदिर बंगाल के शासक शशांक द्वारा स्थापित माना जाता है। यहाँ कई बड़ी-छोटी मूर्तियाँ मिली हैं।
  • वर्ष 1954 में भारत सरकार के द्वारा सभी प्राचीन स्थलों, मूर्तियों आदि का सर्वेक्षण करवाया गया था।

रजरप्पा स्थित माँ छिन्नमस्तिका मंदिर

रखरमा स्थित माँ छिन्नमस्तिका मंदिर राँची से लगभग 87 कि.मी. दूर हजारीबाग जिले के रामगद-बोकारो मार्ग पर गोला से 14 कि.मी. दूर रजरप्पा नामक स्थान पर स्थित है भावी (भेडा) नदी और दामोदर नदी के संगम पर त्रिभुजाकार उच्च भूमि पर महिनमस्तिका का अतिप्राचीन मंदिर स्थित है। शारदीय दुर्गा उत्सव में माँ की महानवमी पूजा सबसे पहले संथालों आदिवासियों द्वारा की जाती है। इन्हीं के द्वारा प्रथम बकरे की बलि दी जाती है।

ईटखोरी का मंदिर

  • ईटखोरी का मंदिर हजारीबाग से 53 कि.मी. दूर चतरा जिले के ईटखोरी पावडर भदली ग्राम के अंतर्गत स्थित है।
  • इसी ग्राम में माँ भद्रकाली का अत्यंत प्राचीन मंदिर मंदिर के मुख्य द्वार के पास स्थित 52 फीट ऊंची, 70 फीट लंबी और 50 फीट चौड़ी एक भव्य यक्षशाला है।
  • इस स्तूप के चारों ओर भगवान् बुद्ध की योगमुद्रा में 1000 आकृतियाँ उत्कीर्ण हैं। इस स्तूप के समीप ही सैकड़ों शिवलिंग स्थापित हैं।

पंचपरगना के प्राचीन मंदिर

पंचपरगना के अंतर्गत सिल्ली, सोनाहातु, बुंडू, तमाड़ और अडकी प्रखंड आते हैं। यहाँ मुंडा जनजाति, सराक (जैन धर्म माननेवाले आदिवासी) अन्य प्रकार के गैरजनजातियों की मिश्रित जनसंख्या निवास करती है।

देवड़ी मंदिर

  • तमाड़ से 3 कि.मी. दूर देवड़ी ग्राम में स्थित विख्यात देवड़ी मंदिर है।
  • इस मंदिर में 16 भुजाओवाली माँ भगवती की प्रतिमा है। इस मंदिर में एक पहान पुजारी सप्ताह में 6 दिनों तक पूजा करता है।
  • ब्राह्मण पुजारी सप्ताह में एक दिन मंगलवार को पूजा करवाता है। दशहरा के अवसर पर भी पहान पुजारी द्वारा ही पशुबलि दी जाती है। यहाँ शिव को पशुबलि देने की आश्चर्यजनक प्रथा है।

नगर ऊँटारी का वंशीधर मंदिर

  • यह मंदिर गढ़वा से 40 कि.मी. दूर स्थित नगर ऊँटारी में प्रतिष्ठित है।
  • इसकी स्थापना संवत् 1885 में गई थी।
  • यहाँ अष्ट धातु से निर्मित स्वर्ण शेषनाग के मस्तक पर जडित कमल पुष्प पर मुसकराती हुई बाँकी चितवन से त्रिभंगी रूप में श्रीकृष्ण वंशी बजा रहे हैं।

कोरांबे में स्थित हल्दीघाटी मंदिर

गुमला जिले के घाघरा के पूर्व में कोरांबे ग्राम स्थित है। यह स्थान नागवंशी राजा तथा रक्सैल के लिए हल्दीघाटी का सन् 1576 में लड़ा गया, यह युद्धस्थल है, जहाँ अकबर और महाराणा प्रताप की सेनाएँ आमने-सामने हुई थीं। कोरांवे में वासदेव राय का मंदिर स्थित है। 

पलामू का किला

इस किले की नींव संवत् 1619 में माघ कृष्ण पंचमी बुध के दिन च्यवन ऋषि कला देव महीपति मेदनी राय ने अपने पुत्र युवराज प्रताप राय के लिए रखी थी। इस किले का सर्वाधिक आकर्षक दृश्य नागपुरी दरवाजा है। यह दरवाजा नागवंशी राजा को हराकर पलामू लाया गया था।

बोडेया मंदिर

  • यह काँके (राँची) के गाँव बोड़ेया में राजा रघुनाथ शाह के सहयोग से सन् 1665 में निर्मित हुआ और इसके निर्माण में 17 वर्षों का लंबा समय लगा। यह राम-सीतालक्ष्मण का भव्य मंदिर है।
  • राँची शहर से आठ कि.मी. दूर बोडेया ग्राम में वैष्णव समूह, का लगभग 325 वर्ष पुराना प्राचीन मंदिर है। यह मंदिर मदनमोहन मंदिर के नाम से भी जाना जाता है।
  • इस मंदिर का शिलान्यास बोड़ेया के लक्ष्मीनारायण तिवारी ने किया था।

कन्हैया स्थान मंदिर

राजमहल से थोड़ी दूर गंगा तट पर स्थित यह मंदिर भगवान् श्रीकृष्ण को समर्पित है। चौतन्य भक्तों का मानना है कि महाप्रभ बंगाल से लौटते हए यहाँ ठहरे थे और इसी स्थान पर उनका भगवान् श्रीकृष्ण से साक्षात्कार हुआ था। इस मंदिर की बड़ी मान्यता है। 

चुटिया मंदिर

  • इस मंदिर का निर्माण भी नागवंशी राजा रघुनाथ शाह द्वारा करवाया गया। इस मंदिर के निर्माण कार्य में हरि ब्रह्मचारी का बड़ा सहयोग रहा।
  • पत्थरों को तराशकर बनाया गया यह मंदिर पहले राजा वल्लभ का था, जो बाद में राम मंदिर में परिवर्तित किया गया। यह मंदिर सन् 1685 में निर्मित हुआ।

मलूटी

मलूटी पश्चिम बंगाल की सीमा पर बसा एक गाँव है, जिसमें 108 मंदिर हैं। इसे भारत सरकार ने विशिष्ट धर्मस्थल के रूप में विकसित कराने का निर्णय लिया है।

चित्रेश्वरी धाम

बहरागोड़ा से 10 कि.मी. दूर स्थित इस मंदिर में भगवान् चित्रेश्वरी महादेव की मूर्ति है। मंदिर के सामने सर्वदा जल से युक्त एक पुष्करिणी है। यहाँ महाशिवरात्रि और श्रावणी पूर्णिमा में एक भव्य मेले का आयोजन किया जाता है।

कोलेश्वरी

  • माँ भगवती कोलेश्वरी मंदिर चतरा जिले के हंटरगंज प्रखंड में 1575 फीट की ऊँचाईवाले कोल्हुआ पर्वत पर स्थित है।
  • यह पर्वत विंध्याचल पर्वतमाला की ही एक श्रेणी है, जहाँ से कर्क रेखा गुजरती है। वास्तव में कोल्हुआ पर्वत तीन धर्मों हिंदू, बौद्ध और जैन का एक सुंदर संगम स्थल है।
  • जैन धर्मावलंबी इसे 23वें तीर्थकर पार्श्वनाथ के चिह्न के रूप में मानते हैं। यह गुफाओं का मंदिर है, जो कालू पहाड़ी पर स्थित है।
  • कई मंदिरों के समूह को ‘कोलेश्वरी का मंदिर’ कहा जाता है। यहाँ पशुबलि दी जाती है और मेले का आयोजन भी होता है।

सूर्य मंदिर

सूर्य के रथ की आकृति में बनाया गया यह मंदिर राँची से 40 कि.मी. दूर जमशेदपुर मार्ग पर बुंडू के निकट स्थित है। इस मंदिर को अपनी भव्य कलाकृति के आधार पर साहित्यकारों ने ‘पत्थर पर लिखी काव्य-रचना’ कहा है।

श्री वंशीधर मंदिर

नगरऊँटारी में स्थित राधा-कृष्ण का यह भव्य मंदिर बहुत प्रसिद्ध है। इसमें पहले केवल श्रीकृष्ण की ही स्वर्ण मूर्ति थी, जिसका वजन लगभग 1,300 किलोग्राम था। राधा-रानी की प्रतिमा यहाँ बाद में स्थापित की गई।

आंजनग्राम मंदिर

  • रामायण काल में वर्णित सात आश्रमों में से एक आश्रम आंजनग्राम भी था, जहाँ रामभक्त हनुमान की माता अंजना की प्राचीन प्रतिमा है। यही स्थान हनुमान की जन्मस्थली भी माना जाता है।
  • पहाड़ी पर स्थित इस चक्रधारी मंदिर में एक ही कतार में 8 भव्य शिवलिंग हैं और भगवान् शिव, भगवान् विष्णु और माँ दुर्गा की मूर्तियाँ यहाँ अवस्थित हैं।
  • ऐसा माना जाता है कि यहाँ कभी 360 शिवलिंग और इतने ही तालाब थे। यह मंदिर गुमला जिले में स्थित है। 

ठाकुरबाड़ी मंदिर

  • लगभग 500 वर्ष पुराना यह मंदिर पाकुड़-साहेबगंज मार्ग पर बड़ाबाच मार्ग तालाब के सामने स्थित है। इस मंदिर में भगवान् शिव का सफेद ज्योतिलिंग है।
  • इस मंदिर के बारे में लोगों की अपार श्रद्धा है। इसे मनोकामना सिद्धि का केंद्र भी माना जाता है। यहाँ गणेश, पार्वती, कृष्ण, हनुमान और माँ काली सहित भगवान् भोलेनाथ की मूर्तियाँ स्थित हैं, जिन्हें ‘ठाकुरबाड़ी’ के नाम से जाना जाता है।

योगिनी मंदिर

बाराकोप पहाड़ी पर स्थित इस मंदिर के बारे में यह मान्यता है कि यहाँ माता सती को दाहिनी जाँघ गिरी थी और उसी के आकार की प्रस्तर प्रतिमा यहाँ स्थापित है, जिस पर श्रद्धालु लाल चुनरी चढ़ाकर अपनी मनौती मांगते हैं।

तेलकुप्पी के मंदिर

दामोदर नदी के किनारे तेलकुप्पी नामक ग्राम में 13 मंदिरों का समूह है, जिसमें अनेक देवी-देवताओं की प्रतिमाएं स्थापित हैं। मुख्य रूप से यह भगवान् शिव का मंदिर है।

जी.ई.एल. चर्च

विभिन्न धर्मों की मिश्रित संस्कृति के प्रतीक झारखंड में ईसाई धर्म के प्रमुख चर्चा में से एक जी.ई.एल. चर्च भी है। इसकी स्थापना फादर गॉसनर ने सन् 1851 में की थी, जिसका निर्माण प्रसिद्ध वास्तुशास्त्री पेस्टर हिराजॉग ने किया था1150 वर्ष पुराने इस चर्च को वर्तमान में भव्यता के आधार पर आधुनिक चर्चों के समकक्ष माना जाता है।

दालमी का मंदिर

मध्यकाल में निर्मित यह मंदिर धनबाद जिले में स्थित है। यह 17वीं शताब्दी में बनाया गया विष्णु मंदिर है। इसमें मदन-रति की आलिंगन मुद्रा में विशाल मूर्ति भी है। इसके निकट ही कार्तिकेय का मंदिर भी है।

दिगंबर जैन मंदिर

यह द्वितलीय मंदिर है, जिसका निर्माण सन् 1920 में हुआ था। इसके निचले तल म तीन वेदियों पर जिनेश्वर प्रभ की प्राचीन पाषाणिक प्रतिमाएँ हैं। यह जैन धर्म का प्रमुख धर्मस्थल है।

इचाक

हजारीबाग से सात-आठ मील उत्तर में इचाक रामगढ़ राजा की राजधानी थी। 1772 ई. में अंग्रेजों के द्वारा रामगढ पर अधिकार करने बाद तेज सिंह ने रामगढ़ को राजधानी इचाक को बनाया एवं वहाँ एक किला बनवाया, जो तीन मंजिला थी। रखरखाव के अभाव के कारण इचाक किला लगभग समाप्त हो चला है।