नवीन पंचायती राज प्रणाली की समीक्षा

नवीन पंचायती राज प्रणाली के माध्यम से पंचायतों को अधिकार देकर उसे स्वायत निकायों के रूप में विकसित करने का प्रयास किया गया ताकि प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण के लक्ष्य को प्राप्त किया जा सके।

विगत 27 वर्षों के पंचायतों की कार्यप्रणाली के आंकड़ों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि पंचायतों को विकास की इकाई के रूप में विकसित किए जाने पर बल दिया जा रहा है परंतु इस दिशा में भी परिणाम अपेक्षाओं के अनुकूल नहीं है।

3 F =

F®Function–दायित्व

F®Functionaries–कार्मिक

F®Fund –  (वित्तीय संसाधान)

पंचायतों को विकासशील दायित्व सौंपने पर विशेष बल दिया गया है परंतु पंचायतों के द्वारा विकासशील दायित्वों के प्रभावी निर्वहन हेतु कार्मिक एवं वित्तीय संसाधनों की उपलब्धता पर पर्याप्त मात्रा में ध्यान नहीं दिया गया।

पंचायतों के स्तर पर पर प्रशासनिक एवं तकनीकी सहायता एवं सहयोग हेतु राज्य सरकार के कर्मचारियों को पदस्थापित किया जा रहा है। ऐसे कर्मचारियो पर आंतरिक नियंत्रण राज्य सरकार का होता है न कि पंचायत प्रतिनिधियों का। ऐसी स्थिति में पंचायतों के स्तर पर कार्यरत कार्मियों की जबावदेहिता पंचायत प्रतिनिधियों के प्रति न होकर राज्य के प्रति होती है। अतः वर्तमान समय की यह मांग है कि यथाशीध्र स्थानीय लोक सेवा का गठन किया जाए ताकि इस सेवाको स्थानीय निकायों के प्रतिनिधियों के प्रति जबावदेहबनाया जा सके।

जिन कार्यों को पंचायतों को सौंपा गया है उससे संबंधित अभिकरण एवं इसके कार्मियों को भी पंचायत प्रतिनिधियों के नियंत्रण में लाया जाना चाहिए।

पंचायतों के वित्तीय स्थिति को अधिक सुदृढ़ बनाने हेतु प्रत्येक राज्य में 5 वर्ष के अंतराल पर राज्य वित्त आयोग का गठन किया जाना है परंतु इसकी कार्य प्रकृति परामर्शीय होने के कारण इसकी अनुशांसाएं राज्य सरकार पर बाध्यकारी नहीं होता है। अतः ऐसी स्थिति में पंचायतों के वित्तीय निर्भरता राज्य सरकार पर अब भी बनी हुई है। राज्य वित्त आयोग के द्वारा मौलिक रूप से राज्य सरकार एवं स्थानीय निकायों के बीच के वित्तीय संसाधनों के वितरण पर अधिक ध्यान दिया जाता है जबकि राज्य वित्त आयोग के द्वारा ऐसे पहलुओं पर भी फिर से ध्यान दिया जाना चाहिए जिसके द्वारा स्थानीय निकाय अपने-अपने स्तर पर वित्तीय संसाधनों को उत्पन्न कर सके।

राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी को प्रोत्साहित करने हेतु कम से 1/3 सीटों का आरक्षण महिलाओं के द्वारा किया जा रहा है। यह प्रयास भारतीय राजनीति में एक मील का पत्थर माना गया है।

इस प्रावधान के परिणाम स्वरूप पंचायतों के स्तर पर महिलाओं की भागीदारी में अप्रत्याशित बढोत्तरी हुई है जो कि लगभग 50 प्रतिशत तक के आंकड़ों को प्राप्त कर चुकी है। परंतु राजनीतिक प्रक्रिया में महिलाओं की भूमिका को सक्रिय बनाया जाना संभव नहीं ही पाया है जिसका मौलिक कारण सामाजिक एवं सांस्कृतिक पृष्ठभूमि से संबंधित है।

अतः यह आवश्यक है महिलाओं के सामाजिक एवं आर्थिक विकास के स्तर पर बहुआयामी प्रयास किया जाए एवं महिलाओं हेतु आरक्षण के प्रावधान को प्रजातांत्रिक संरचना के उच्चत्तर स्तरों पर भी लागू किया जाए। वर्तमान समय के लोकसभा एवं विधान सभाओं में महिलाओं के आरक्षण हेतु 108वें संविधान संशोधन विधेयक विचाराधीन है।

पंचायतों के तीन स्तरों में सबसे अधिक उपेक्षित स्तर मध्यवर्गीय स्तर को माना गया है। अतः सरकार के द्वारा मध्यवर्ती स्तर के पंचायत के गठन पर पुर्नविचार किया जाना चाहिए।

ग्राम पंचायत – परिपालन हेतु मुख्य कार्य – 96

मध्यवर्ती स्तर – पर कार्य पर्यवेक्षण -1

जिला के स्तर पर पंचायत – का कार्य समन्वय -3

पंचायतों को प्रजातांत्रिक विकेंद्रीकरण की इकाई के रूप में विकसित करने हेतु यह आवश्यक है कि ग्राम सभा का अधिक सशक्तिकरण किया जाए। इस दिशा में यह आवश्यक है कि ग्राम सभा की बैठक को अधिक नियमित किया जाए एवं इसके सदस्यों की उपस्थिति को प्रोत्साहित करने का हर संभव प्रयास हो। ग्राम सभा के द्वारा ग्राम पंचायतों पर नियंत्रण किया जाना चाहिए ताकि वास्तविक सत्ता को व्यवहारिक स्तर पर हस्तांतरित किया जा सके। अतः ग्राम सभा का अधिक शक्तिशाली होना ग्राम पंचायतों की सफलता का एक मूल आधार है।

पंचायतों को अधिक शक्तिशाली बनाने की दिशा में स्थानीय शासन पर द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग के द्वारा महत्वपूर्ण अनुशांसाएं की गई है। अतः वर्तमान समय की मांग है कि इन अनुशसाओं पर प्राथमिकता से विचार करते हुए इसे यथाशीध्र क्रियान्वित क्रिया जाए।

(कुँवर आईंस्टीन)

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