राष्ट्रवाद

राष्ट्र लोगों के ऐसे समुदाय को कहते हैं जिनके समूहों के बीच आपस में जुड़ाव होता है| जो एक ही रीति-रिवाज एवं परंपरा से प्रभावित होते हैं तथा वे एक ही ऐतिहासिक शक्ति की उपज होते हैं।

यह किसी राष्ट्र की एक सामान्य परिभाषा है किंतु जब हम आधुनिक राष्ट्रवाद को परिभाषित करते हैं तो फिर हमें यह ज्ञात होता है कि आधुनिक राष्ट्रवाद के लिए जनसंप्रभुता एक सामान्य कारक बन कर आती है।

फ्रांस की क्रांति के मध्य जो आधुनिक राष्ट्रवाद की भावना विकसित हुई वह नेपोलियन के युद्धों के माध्यम से संपूर्ण यूरोप में फैल गई।

यूरोप से बाहर राष्ट्रवाद का प्रसार

उत्तरी अमेरिका में संयुक्त राज्य अमेरिका को आजादी पहले ही मिल गई थी आगे फ्रांस की क्रांति के पश्चात लैटिन अमेरिका में राष्ट्रवाद (की भावना) का प्रसार देखा गया| उस काल में अधिकतर लैटिन अमेरीकी राज्य स्पेन के उपनिवेश थे। 1820 के पश्चात उपनिवेशों ने भी स्वतंत्रता हासिल कर ली किंतु यहां अमेरिकी सहायता के अनुरूप राष्ट्रवाद का विकास नहीं हो सका। वस्तुतः इनकी स्वतंत्रता भी नाममात्र की स्वतंत्रता बनी रही तथा ये राष्ट्र प्रजातांत्रिक संस्थाओं का विकास करने में विफल रहे। व्यवहार में ये संयुक्त राज्य अमेरिका के अंध उपनिवेश बन कर रह गए थे।

एशिया तथा अफ्रिका में राष्ट्रवाद का विकास      

यूरोपीय शिक्षा पद्धति एवं यूरोपीय संस्थाओं के माध्यम से पहले एशिया में और फिर अफ्रीका में राष्ट्रवाद का विकास हुआ। किंतु इन महाद्वीपों की आर्थिक-सामाजिक संरचना यूरोप से पृथक रही थी इसलिए इन देशों में यूरोपीय राष्ट्रवाद का प्रारूप सफल नहीं रहा।

19वीं सदी में यूरोप में राष्ट्रवाद का जो प्रारूप विकसित हुआ था वह एक राष्ट्रीय भाषा एवं एक स्वरूप वाली सांस्कृतिक संरचना पर आधारित था। किंतु एशिया महाद्वीप के अधिकांश देश अपने स्वरूप में बहुल नस्लीय, बहुल भाषायी एवं बहुल सांस्कृतिक थे। इसलिए यूरोपीय राष्ट्रवाद का वह प्रारूप उन पर ज्यों का त्यों लागू नहीं हो सकता था दूसरी तरफ अफ्रिका की स्थिति और भी भिन्न थी। वस्तुतः अफ्रिका के प्रत्येक क्षेत्र में अनेक जनजातीय समूहों का मिश्रण था।

फिर जब यूरोपीय शक्तियों ने अफ्रीका में अपना विस्तार किया तो उन्होंने विभिन्न जनजातीय समूहों को मिलाकर कृत्रिम रूप में राष्ट्र का गठन कर दिया। सबसे दिलचस्प तथ्य यह था कि अफ्रीकी राष्ट्रों का निर्माण 1884 के उस बर्लिन अफ्रीकन कांग्रेस के द्वारा बिस्मार्क की अध्यक्षता में हुआ था जिसमें अफ़्रीकी समाज की भागीदारी नहीं थी इसलिए अफ्रीकी समाज की मौलिक पहचान जनजातीय ही बनी रही। यद्यपि स्वतंत्रता आंदोलन के मध्य इन जनजातीय समूहों के बीच परस्पर एकता कायम रही किंतु जैसे ही इन्हें स्वतंत्रता प्राप्त हुई इनका पुराना जनजातीय तनाव उभर कर आ गया। इसके कारण इथियोपिया और सूडान, ये दोनों राष्ट्र विघटित हो गए। जबकि अनेक अफ्रीकी राष्ट्र गृह युद्ध के शिकार हैं।

भारत में राष्ट्रवाद का प्रारूप

भारत में भी आरंभ में यूरोपीय प्रारूप पर भारतीय राष्ट्र को संगठित करने का प्रयास किया गया था इसलिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के द्वारा यह नारा दिया गया था हिंदी हिंदु हिन्दोस्तान दूसरे शब्दों में एक राष्ट्रभाषा हिंदी के आधार पर भारतीय राष्ट्र को संगठित किया जाना था।

राष्ट्रीय आंदोलन के मध्य अहिंदी भाषी प्रदेश के लोगों ने भी इस संदर्भ में अपना उत्साह दिखाया था किंतु जैसे ही भारत को आजादी मिली, यहां भाषाई विवाद का मुद्दा गहराने लगा। मुद्दे दो थे-एक मुद्रा राष्ट्रवाद और राज्य भाषा का था तो दूसरा मुद्दा भाषायी आधार पर प्रांतों के गठन का था। राजभाषा का मुद्दा यह था कि गैर हिंदी प्रदेश के लोगों में एक प्रकार का डर था कि अगर हिंदी ही राजभाषा के रूप में स्थापित हो गई तो फिर सरकारी सेवा में हिंदी का वर्चस्व स्थापित हो जाएगा। उसी प्रकार भारत के विभिन्न क्षेत्रों के लोग चाहते थे कि भाषाई पहचान का सम्मान किया जाए और एक भाषा के लोगों को एक प्रांत में शामिल किया जाए। स्वतंत्र भारत की सरकार ने उपर्युक्त दोनों ही मुद्दों पर बड़ा ही व्यवहारिक निर्णय लिया। हिंदी के साथ-साथ अंग्रेजी को सह-राजभाषा के रूप में स्वीकृति देकर गैर-हिंदी भाषी लोगों को सरकारी सेवाओं में सुरक्षा दी। इतना ही नहीं अपितु संविधान की आठवीं अनुसूची में 14 भाषाओं को स्वीकृति देकर (जो कि अब 22 हो चूका है) हमने राष्ट्रवाद का एक ऐसा मॉडल विकसित किया जो यूरोप की तरह एक भाषा पर आधारित न होकर 14 भाषाओं पर आधारित था। उसी प्रकार भाषायी आधार पर प्रांतों के गठन को स्वीकृति प्रदान कर हमने भाषायी अल्पसंख्यकों की भावना को संतुष्ट कर दिया। इसका स्वभाविक परिणाम हुआ कि वे भारतीय राष्ट्र की मुख्य धारा में आसानी से धुल-मिल गए। इस प्रकार भारत ने राष्ट्रवाद का एक वैकल्पिक मॉडल विकसित किया जो पश्चिमी मॉडल से पृथक था एवं एशियाई-अफ्रीकी देशों की जरूरतों के अनुकूल था। यही वजह है कि इस आरंभिक आशंका के बावजूद भी कि भारत का चरित्र इतनी विवधातामूलक है कि यह अपनी एकता और अखंडता को बनाकर नहीं रख सकेगा। इसने सफलतापूर्वक अपनी एकता और अखंडता को बनाए रखा। इसके विपरीत न केवल अनेक एशियाइ-अफ्रीकी देश अपितु पूर्वी यूरोप के (देश) राष्ट्र भी विघटन और गृहयुद्ध के शिकार हो गए।

भारत में राष्ट्रवाद का निर्माण

भारत में राष्ट्रवाद का उदभव जटिल प्रक्रिया का परिणाम था। इस पर पश्चिम का प्रभाव तो मान सकते हैं किंतु हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि राष्ट्रवाद की आरंभिक उत्प्ररेणा देशी ही थी अर्थात ब्रिटिश शासन ने भारत के जातीय और कृषक समुदाय पर नकारात्मक प्रभाव छोड़ा था। स्वभाविक रूप से इन समुदायों ने इसके विरुद्ध तीव्र प्रतिक्रिया दिखाई इसलिए भारत में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आरंभिक प्रतिरोध जनजातीय और किसान आंदोलन के रूप में व्यक्त हुआ था। आगे 1857 के महाविद्रोह के संबंध में हमेशा ही मूल्यांकन एवं पुर्नमूल्यांकन की समस्या बनी रही किंतु नवीन शोधों से यह तथ्य स्पष्ट हो चुकी है कि इस महाविद्रोह का व्यापक भौगोलिक प्रसार रहा था तथा इसमें राजा, कुलीन, सिपाही के अतिरिक्त किसान शिल्पी एवं जातीय समूह भी शामिल हुए थे इसलिए इसे भारत के प्रथम सवतंत्रता आंदोलन की संज्ञा दी जाने लगी है भले ही यह आधुनिक राष्ट्रवाद की कसौटी पर खरा नहीं उतर पाता। वस्तुतः आधुनिक राष्ट्रवाद का मॉडल पश्चिमी यूरोप में निर्मित हुआ था तथा आधुनिक राष्ट्र से आशय था कि किसी क्षेत्र विशेष में निवास करने वाले विभिन्न साथ समूहों के बीच कुछ सामान्य मुद्दों पर परस्पर जुड़ाव। यह विकास भारत में राष्ट्रीय आंदोलन के मध्य देखने को मिलता है। वस्तुतः भारतीय राष्ट्रवाद की आरंभिक अभिव्यक्ति समाज तथा धर्म आंदोलन के माध्यम से देखने को मिलती है। अगर  एक तरह से देखा जाए तो यह आंदोलन भारतीय समाज की एक शल्य चिकित्सा थी। इसलिए इसे भारतीय पुनर्जागरण का नाम  भी दिया गया था|

गाँधी के पहले भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस दो धरों में बंटी हुई थी और दोनों धरों का प्रतिनिधित्व संभ्रांत जनों के पास ही था| इस प्रकार चाहे उदारवादी चरण हो या उग्रवादी चरण वे भारतीय राष्ट्रीय आंदोलन में अभिजात्य चरण का ही प्रतिनिधित्व करते रहे थे। न तो इसमें जनजातीय और कृषक तत्वों को प्रतिनिधित्व मिला था और न ही दलित वर्ग को| आगे गांधी ने इस कमी को पूरा करने का प्रयास किया जब उन्होंने कांग्रेस के आंदोलन को किसान, जनजातीय समूह एवं दलित वर्ग के उत्थान से जोड़ा। इस प्रकार उन्होंने समावेशी राष्ट्रवाद का विकास करने का प्रयास किया। इस प्रक्रिया में भारत के वामपंथी दलों एवं संगठनों ने भी अपनी भूमिका निभाई क्योंकि उन्होंने भी भारतीय किसानों और श्रमिकों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने का प्रयास किया।

राष्ट्रवाद से संबंधित कुछ प्रश्न :

1.प्रश्न : क्या भारत में स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्र निर्माण की प्रक्रिया साथ-साथ चली?

2.प्रश्न : क्या वर्तमान में भारतीय राष्ट्रवाद को आप समावेशी राष्ट्रवाद मानते हैं?