झारखंड के प्रमुख वाद्य-यंत्र

झारखंड के प्रमुख वाद्य-यंत्र

  • आदिवासियों की जीवन-शैली में संगीत और नृत्य की प्रधानता है।
  • यहाँ के जीवन में प्रायः हर प्रकार के समारोह अथवा अनुष्ठान में संगीत-नृत्य अनिवार्य नामकरण, शादी-विवाह, पर्व-त्योहार, कृषि एवं विभिन्न धार्मिक अवसरों के जन संगीत के बिना संपन्न नहीं होते हैं।
  • किसी भी संगीत में वाद्य-यंत्र का स्थान पर्ण होता है। इसी प्रकार वाद्य-यंत्र के बिना झारखंडी संगीत का आनंद अधूरा है। इसलिए झारखंड के भौगोलिक एवं सांस्कृतिक परिवेश की आवश्यकतानुसार स्थानीय स्तर पर सुगमता से उपलब्ध संसाधनों द्वारा ही वाद्य-यंत्रों का निर्माण किया जाता है।
  • इन बाद्य-यंत्रों के निर्माण में समाज के सभी समुदायों का सहयोग होता है। प्राय: वाद्य-यंत्रों में विभिन्न सामग्रियों एवं कुशल शिल्प की आवश्यकता होती है, जिसमें समाज के शिल्पकार समुदायों का महत्त्वपूर्ण योगदान होता है। इन वाद्य-यंत्रों की विशिष्टता यह भी है कि झाँझ व करताल को छोड़कर प्राय: सभी वाद्य-यंत्र पुरुषों द्वारा बजाए जाते हैं।
  • झारखंड के वाद्य यंत्रों को उनकी बनावट के अनुसार चार श्रेणियों में विभक्त किया जा सकता है। ऐसे वाद्य-यंत्र, जिनमें ताँत या तंत् अथवा डोरी या तार को रगडने अथवा छेड़ने से ध्वनि उत्पन्न होती है, उन्हें ‘तंतु वाद्य’ कहते हैं। इस श्रेणी में केंदरा, बनम, बउंग, टुइला और एकतारा आदि आते हैं। इन वाद्य-यंत्रों को गज अथवा कमानी के द्वारा रगड़ा जाता या उँगली से छेड़ा जाता है, जिससे ध्वनि उत्पन्न होती है। रेतकर उत्पन्न हुए स्वरों को दूसरे हाथ की उँगलियों के संचालन द्वारा नियंत्रित किया जाता है।
  • दूसरी श्रेणी में मुंह से फूंककर बजाए जानेवाले वाद्य-यंत्र आते हैं, जैसे बाँसुरी, सनाई या शहनाई, सिंगा, मदनभेरी निशान आदि।
  • तीसरी श्रेणी में विभिन्न प्रकार के चर्म वाद्य आते हैं, जिनको हथेली-उँगलियों अथवा लकड़ी की पतली व छोटी छडी से पीटकर बजाया जाता है। ये सभी मूलतः तालवाद्य ही हैं, क्योंकि गीत की लय एक समान बनाए रखने में इनका योगदान रहता है। इस श्रेणी में माँदर, नगाडा, टामाक, ढोल, ढाक इत्यादि आते है।
  • चौथी श्रेणी के वाद्य-यंत्र यद्यपि ताल वाद्य ही हैं, तथापि उनकी भूमिका प्रमुख न सहयागी वाद्य के रूप में होती है। इस श्रेणी में झाल, करताल, थाल, घटा, घुघरू, आदि आते हैं, जो प्राय: ताल के सम पर बजाए जाते हैं । पाश्चात्य संगीत मजीरा, सेकोए आदि आते हैं, जो प इनको ‘परकसन इंस्टमेंट कहते हैं।

ताँत या तंतु वाद्य

ऐसे वाद्य-यंत्र हैं, जिनमें रेशम की डोरी, ताँत, लौहे, ताँबे या पीतल के तार बँधे होते हैं।  इन्हें दो प्रकार से बजाया जाता गई हैं –

  1. रेशम की डोरी, ताँत या धातु के तारों को उँगली, हाथी दाँत, स्ट्राइकर, लकड़ी आदि से छेड़ा जाता है; जैसे टोहिला, एकतारा, गावगुबी आदि।
  2. जिन वाद्य-यंत्रों में तारों के नीचे चमड़ा मढ़ा होता है, उन तारों को घोडे के बालों से बने धनुष या कमानी से रेतकर बजाया जाता है।

केंदरा

केंदरा छोटनागपुर क्षेत्र का लोकप्रिय तंतु वाद्य है, जिससे कोमल व करुण स्वर उत्पन्न होते हैं। हिंदुस्तानी संगीत में यह स्थान सारंगी को दिया जा सकता है। स्वर की तीव्रता धीमी व कोमल होने के कारण इसको माँदर, नगाड़ा अथवा ढोल या ढोलक के साथ बजाए जाने पर इसका स्वर गौण हो जाता है। इसी कारण चर्म वाद्यों के थमने पर प्रायः इसे एकल गीत के साथ बजाया जाता है।

इसका निर्माण लगभग चार फीट के एक खोखले बाँस की छड़ी के दोनों सिरों पर सूखी लौकी के दो गोलाकार खोलों को बाँधकर किया जाता है। दोनों ही छोरों पर लकड़ी से बनी खूटियाँ लगी होती हैं, जिन पर तारों को बाँधा जाता है। तारों के बचे हुए अंश को निकट ही लगी अन्य खूटी में बाँध दिया जाता है । देखने में यह वीणा का देशज स्वरूप लगता है, लेकिन इसमें ध्वनि तारों पर गज या कमानी चलाने से निकलती है।

बनम या बानाम

यह तंतु वाद्य संथाल समुदाय का प्रिय वाद्य-यंत्र है। इसका उपयोग गीत के साथ संगत के रूप में किया जाता है। इसका निर्माण नारियल के खोल को आधा काटकर उसके ऊपर गोह का चमड़ा मढ़कर किया जाता हैं। गोह गिरगिट प्रजाति का, लेकिन उससे कई गुना बड़ा रेंगनेवाला जंतु है, जो संथाल परगना क्षेत्र में प्रचुरता से उपलब्ध है। इसका चमड़ा मजबूत होता है। मढ़े हुए खोल से लकडी अथवा बाँस का दंड जुड़ा होता है। इस दंड के ऊपरी सिरे पर दोनों ओर दो-दो खुटियाँ लगी होती हैं। नारियल के खोल के निचले सिरे में लगी खूटी से तीन अथवा चार ताँत या तार निकालकर मढ़े गए चमड़ के ऊपर से ले जाकर दंड के ऊपरी सिरे पर लगी खौटयों में अलग-अलग बाँध दिया जाता है। ताँत या तार चमड़े का स्पर्श न करें, इसलिए नारियल के चमड़ा मढ़े खोल के लगभग बीच में एक पतली लकड़ी या घोडा लगा दिया जाता है। इसके चारों अथवा तीनों तार चमड़े की सतह से ऊपर उठे और तने हुए रहते हैं। इन तारों को घोड़ों की पूँछवाली कमानी से रगड़ने या रेतने पर थोड़ी मोटी ध्वनि निकलती है। यह पाश्चात्य संगीत में प्रयुक्त होनेवाले तार वायलिन का देशज रूप है।

बुअंग या भुआंग

यह संथाल समुदाय का प्रिय वाद्य है। इस वाद्य-यंत्र में दो भाग होते हैं-पहला, धनुष और दूसरा, सूखी सूखी लौकी का तुंबा, जिसका एक सिरा खुला होता है। आमतौर पर जहाँ धनुष पकड़ा जाता है, अर्थात् लगभग मध्य में लौकी का लगभग डेढ़ फीट लंबा साकर बाँधा जाता है। तुंबे का निचला सिरा खुला होता है। इसे बजाने के लिए बाए हाथ से धनुष पकड़कर दाएं हाथ से धनुष की रस्सी खींचकर छोड़ने से ‘बुअंगकी ध्वनि निकलती है। इससे एक ही प्रकार का स्वर निकलता है, इसलिए यह ताल के सम पर बजाया जाता है।

टुइला या टोहिला

कोमल स्वरवाला यह वाद्य और इसके वादक अब लुप्तप्राय हो रहे हैं, क्योंकि इस यंत्र को बजाने की प्रक्रिया अत्यंत जटिल है। इसके कोमल स्वर के कारण ही इसे प्रायः अन्य चर्म वाद्य के साथ नहीं बजाया जाता है और गीत के साथ इसकी संगत की जाती है। इसको बनाने के लिए लगभग 3-4 फीट को खोखली लाठी ली जाती है। लाठी के मोटेवाले सिरे पर एक सूखी लौकी के कटे हुए आधे खोल को आधार की ओर से रखकर जड़ दिया जाता है। कटे हुए आधे भाग का मुँह खुला रहता है। इस आधे भाग के अंदर रेशम के मोटे धागे से धातु का छल्ला कस दिया जाता है। रेशम के धागे को खोखली लाठी के दूसरे सिरे पर दो-तीन स्थान पर बाँध दिया जाता है। वादक टुइला या टोहिला को एक हाथ से अपने सीने से सटाए रखता है और दूसरे हाथ की उँगलियों से रेशम के धागे को छेड़ता अथवा रगड़ता है। इसके साथ ही सीने से सटे लौकी के खुले सिरे को कभी हटाता और कभी पुन: सटा लेता है। इससे इच्छित कोमल व करुण स्वर निकलता है।

एकतारा

इसके नाम से ही स्पष्ट है कि एकतारा एक तंत्री वाद्य है। सामान्यतः इसका प्रयोग साधु, भिक्षुओं और फकीरों द्वारा भक्ति गीतों भजनों के साथ संगत करने के लिए किया जाता है। इससे निकलनेवाला एक ही स्वर शायक को स्वर का आधार प्रदान करने के व साथ ताल भी बनाए रखता है। इसके निर्माण के लिए लौकी का आधा कटा सूखा लया जाता है, जिसके ऊपर चमड़ा मढ़ दिया जाता है। लौकी के दो सिरों में बाँस भग तीन-साढ़े तीन फीट की दो खपच्चियाँ कस दी जाती हैं। खपच्चियों के जाड़ दिए जाते हैं और बीच में बाँस अथवा लकड़ी की खूटी डाल दी जाती। लोकी के  खोल के मध्य से एक तार निकालकर इसके बीच में डाली गई खूटी में लपेट दिया जाता है। खूंटी  बाएँ घूम सकती है। इससे तार को कसने अथवा ढीला करने में मदद मिलती है। वादक एक हाथ की हथेली से बाँस की दोनों खपच्चियों को इस हता है कि उसकी तर्जनी तार को छेड़ने के लिए स्वतंत्र होती है। तार छेड़ने मोटा बनाने के लिए खपच्चियों पर करके आघात से बचाने के लिए पर स्वर निकलता है, जिसको इच्छानुसार पतला या मोटा बनाने के लिए पकड कसी अथवा ढीली की जाती हैं। उँगली को तार के आघात सेवा धातु का त्रिकोण टुकड़ा भी पहना जाता है।

सारंगी

तंतु वाद्य-यंत्रों के अतिरिक्त सारंगी भी एक प्रमुख वाद्य-यंत्र है, जिसकी व बनम या बानाम जैसी होती है। अंतर इतना ही है कि इसका आधार और कपाँ दोनों बनम से अधिक चौड़े होते हैं। इसे आधार की ओर से गोद में रखकर कर को कंधे पर रखकर कमानी से बजाया जाता है। उँगलियों के नाखूनों को तारों पर आगे. पीछे रखते हुए इसके स्वरों को नियंत्रित किया जाता है।

 

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