राज्यपाल केंद्र सरकर का एजेंट है या नहीं

जिस प्रकार राष्ट्रपति में संघ सरकार के स्तर पर कार्यपालिका शक्ति निहित होती है ठीक उसी प्रकार राज्यपाल में राज्य सरकार के स्तर पर कार्यपालिका शक्ति निहित होती है| राष्ट्रपति एवं राज्यपाल को अपने कर्तव्यों का निर्वह्न स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारीयों के द्वारा करना है परन्तु राष्ट्रपति एवं राज्यपाल कुछ परिस्थितियों को छोड़कर अन्य सभी कर्तव्यों के निर्वहन में क्रमश: संघीय मंत्री परिषद एवं राज्य मंत्री परिषद के सलाहों के अनुरूप करना है| हम जानते हैं कि संघीय मंत्री परिषद के प्रमुख प्रधानमंत्री होते हैं तो राज्य मंत्री परिषद के प्रमुख मुख्यमंत्री होते हैं| अतः संघ के स्तर पर वास्तविक कार्यपालिका शक्ति का अभ्यास प्रधानमंत्री एवं मंत्री परिषद करती है तो राज्य के स्तर पर वास्तविक कार्यपालिका शक्ति का अभ्यास मुख्यमंत्री एवं मंत्री परिषद के द्वारा किया जाता है|

अब प्रश्न यह उठता है की जब राज्य के स्तर पर वास्तविक कार्यपालिका  शक्ति का अभ्यास मुख्यमंत्री एवं मंत्री परिषद करती है तो राज्यपाल के पद को लेकर केंन्द्र एवं राज्य सरकार के बीच मतभेद क्यूं उत्पन्न हो जाती है|

इसका जबाब यह है कि संविधान ने राज्यपाल को कुछ विवेकाधिकार  की शक्ति भी दी है जिसका अभ्यास करने हेतु राज्यपाल को मंत्री परिषद की अनुशंषा की जरुरत नहीं पड़ती है|

जैसे प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगाने की अनुशंषा वाली रिपोर्ट राज्यपाल राष्ट्रपति को बिना राज्य मंत्री परिषद् की अनुशंषा के भेज सकती है साथ ही राज्य विधेयक को राष्ट्रपति की अनुमति लेने हेतु अपने पास आरक्षित रख सकती है एवं चुनाव उपरांत किसी भी पार्टी को स्पष्ट बहुमत नहीं आने की दशा में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग कर किसी भी पार्टी को सरकार बनाने हेतु आमंत्रित कर सकती है |

समस्या तब उत्पन्न होती है जब केंद्र एवं राज्य में दो अलग-अलग पार्टी की सरकार होती है इसी परिप्रेक्ष्य में बिन्दुवार हम चर्चा करेंगे कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट है या नहीं|

64वीं BPSC में इसी अवधारणा पे एक प्रश्न पूछा गया था कि क्या राज्यपाल एक कठपुतली हैं जिसे बाद में राजभवन की आपत्ति पर आयोग ने अपने प्रश्न से ही हटा दिया था और अशिष्ट शब्द के प्रयोग हेतु प्रश्न बनाने वाले को भी प्रतिबंधित कर दिया गया था|

राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट है  :-

  1. राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रवति के द्वारा की जाती है जो कि संघ सरकार की परामर्शों पे आधारित होती है।
  2. राज्यपाल के द्वारा स्वनिर्णय की शक्तियों का अभ्यास केंद्र सरकार के नियंत्रण के आधीन किया जाता है।
  3. राज्यपाल राष्ट्रपति के प्रसादपर्यंत अपने पद को धारण करता है जो कि अंततः केंद्र सरकार की इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है।
  4. केंद्र के स्तर पर सरकार में परिवर्तन होने के साथ राज्यपालों का फेरबदल किया जाना यह दर्शाता है कि राज्यपाल केंद्र सरकार का एक एजेंट है।
  5. अब तक के व्यवहारिक अनुभवों के आधार पर यह प्रतीत होता है कि अधिकांश अवसरों पर राज्यपाल के द्वारा केंद्र सरकार के एजेंट के रूप में कार्य किया गया।

राज्यपाल केंद्र सरकार का एजेंट नहीं है :-

  1. संविधान के द्वारा राज्यपाल को सौंपी गई अधिकांश शक्तियों का अभ्यास राज्य मंत्री परिषद के परामर्शों के आधार पर किया जाना है न कि केंद्र सरकार के दिशा-निर्देशन के आधार पर।
  2. राज्यपाल के वेतन का भुगतान राज्य की संचित निधि से न कि भारत सरकार की संचित निधि से।
  3. संविधान के अनुच्छेद-159 के अंतर्गत वर्णित राज्यपाल का शपथ यह स्पष्ट करता है कि राज्यपाल राज्य सरकार का संवैधानिक प्रमुख है न कि केंद्र सरकार का एक एजेंट।
  4. संघीय शासन प्रणाली में गठित विभिन्न समितियों/आयोगों के द्वारा इस बात पर बल दिया गया है कि राज्यपाल को निष्पक्ष रहते हुए राज्य सरकार के संवैधानिक प्रमुख के रूप में अपने दायित्वों का निर्वहन करना चाहिए जैसे सरकारिया आयोग, पूंछी आयोग, प्रशासनिक सुधार आयोग (प्रथम व द्वितीय) इत्यादि।

निष्कर्ष: राज्यपाल संवैधानिक दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण पद है। राज्यपाल को जो भी संवैधानिक दायित्व सौंपे गए हैं वह दो विचारधाराओं संसदीय शासन प्रणाली एवं संघीय शासन प्रणाली के संतुलन का एक परिणाम है|

अतः राज्यपाल की दोहरी भूमिका-

  1. राज्य सरकार के संवैधानिक प्रमुख के रूप में।
  2. केंद्र सरकार के प्रमुख प्रतिनिधि के रूप में।

राज्यपाल की शक्तियां का स्रोत संविधान में है एवं केंद्र सरकार की शक्तियों का स्रोत भी संविधान है। अतः राज्यपाल केंद्र सरकार के प्रत्योयोजित या हस्तांतरित शक्तियों का अभ्यास नहीं करता है। कुल मिलाकर राज्यपाल अधिक से अधिक राज्य स्तर पर केंद्र सरकार का एक प्रमुख प्रतिनिधी हो सकता है न कि ऐजेंट।

राज्यपाल की दोहरी भूमिका होने के कारण इस पद के दायित्व चुनौतिपूर्ण हैं। अतः इसके निर्वहन की दिशा में आरोप एवं प्रत्यारोप का होना स्वाभाविक है|

राज्यपाल संघ एवं राज्य सरकार के बीच एक प्रमुख समन्वयकर्ता :

एक समन्वयकर्ता के रूप में कार्य करते हुए राज्यपाल के द्वारा संध एवं राज्यों के बीच के पारस्परिक हितों के बीच के संतुलन को प्राप्त किया जाना आवश्यक है एवं ऐसा करते समय राज्यपाल से यह अपेक्षा की जाती है कि वह संविधान के शब्दों के साथ-साथ उसकी आत्मा या भाव या सार को सर्वोपरि मान्यता दे।

 

(कुँवर आईंस्टीन)

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