पहचान और लोक नीति

पहचान-आधारित लोक नीति उतनी प्रभावी नहीं हो सकती है, जितनी की सार्वभौमिक दृष्टिकोण पर आधारित होती है

पुलाप्रे बालकृष्णन और रोहित उन्नीकृष्णन

कुछ राजनीतिक दलों ने मांग की है कि जनगणना में जाति की गणना की जाए। दरअसल, अनुसूचित जाति (SCs) और अनुसूचित जनजाति की गणना पहले ही सार्वजानिक की जा चुकी अब अन्य पिछड़ा वर्ग के अंतर्गत आने वाली जातियों की जनसँख्या को सार्वजानिक करने की मांग है। इस मांग के साथ यह तर्क भी दिया गया है कि पूरी आबादी के कल्याण को बढ़ाने के लिए लोक नीति की प्रभावशीलता भारतीयों की उनकी जाति के आधार पर गणना से जुड़ी हुई है। इस तर्क का आकलन करने के लिए एक दृष्टिकोण उन राज्यों में विकास के परिणामों की तुलना करना होगा जहां राजनीतिक दलों ने उन राज्यों के साथ जाति-आधारित लामबंदी को अपनाया है, जहां राजनीतिक कार्यक्रमों ने पहचान की राजनीति का सहारा लिए बिना सामाजिक लोकतांत्रिक मार्ग अपना लिया है। तमिलनाडु पूर्व का उदाहरण होगा, जबकि केरल बाद का उदाहरण होगा। इसलिए इन राज्यों के विकास के अनुभव की तुलना शिक्षाप्रद होगी।

तीन चर के साथ निष्कर्ष

चूंकि सभी सामाजिक समूहों में डेटा की उपलब्धता सीमित है, इसलिए हमने तीन चरों पर ध्यान केंद्रित किया। ये थे वयस्क साक्षरता, शिशु मृत्यु दर और उपभोग। इनमें से प्रत्येक संकेतक संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम के मानव विकास सूचकांक के तीन घटकों में से एक से संबंधित है। रुचि के विकास संकेतकों को चुनने के बाद, दो तरीके हैं जिनसे हम आबादी में सबसे कम समृद्ध की स्थिति में अंतर का आकलन कर सकते हैं, इस मामले में अनुसूचित जाति, अलग-अलग संचालित सामाजिक कार्यक्रमों द्वारा। किसी भी संकेतक के लिए, हम या तो समूहों के बीच इसके वितरण के संदर्भ में किए गए प्रभाव या एक समूह द्वारा प्राप्त पूर्ण स्तर पर ध्यान केंद्रित कर सकते हैं।

तमिलनाडु और केरल की तुलना में, उपभोग  के लिए – आय के लिए एक प्रॉक्सी – सामान्य आबादी और अनुसूचित जाति के बीच का अंतर केरल में तमिलनाडु की तुलना में अधिक है, लेकिन जब अन्य दो संकेतकों की बात आती है तो यह कम होता है। हालांकि, जब हासिल किए गए पूर्ण स्तर की बात आती है, तो केरल के अनुसूचित जाति तीनों संकेतकों में तमिलनाडु के अनुसूचित जाति से बेहतर स्थिति में हैं। दिलचस्प बात यह है कि वे भारत की सामान्य आबादी से भी बेहतर हैं, यानी उनके पास बेहतर उपभोग, साक्षरता और शिशु मृत्यु दर है। यह ध्यान देने योग्य है। साथ ही, एकल सापेक्षिक स्थिती पर ध्यान केंद्रित करते समय अभ्यास ने एक खतरे का भी खुलासा किया। हमने पाया कि एक से अधिक संकेतकों के लिए, अनुसूचित जाति और सामान्य आबादी के बीच की दूरी देश के स्तर पर बहुत कम है, क्योंकि यह माना जाता है कि दो राज्यों में से कम से कम एक में ऐसा है, भले ही संबंधित राज्य ने समान संकेतक के लिए एक बेहतर स्तर दर्ज किया हो। यह हमें मूल्यांकन में मैक्समिन सिद्धांत की ओर झुका देता है, जिसके अनुसार उस नीति को प्राथमिकता दी जाती है जो किसी समाज में सबसे खराब स्थिति में अधिकतम सुधार करती है। अब, केरल को बेहतर प्रदर्शन करने वाले के रूप में चुना जाएगा, क्योंकि वहां सबसे अधिक वंचितों के उच्च संकेतक हैं। यद्यपि हम एक निश्चित निष्कर्ष पर पहुंचने के लिए और अधिक विश्लेषण और नियंत्रणों के उपयोग के साथ कर सकते थे, यह सबूत कम से कम यह सुझाव देता है कि पहचान-आधारित लोक नीति एक पहचानविहीन या सार्वभौमिक दृष्टिकोण पर आधारित लोकनीति एक रूप में प्रभावी नहीं हो सकती है जो की एक सामाजिक लोकतंत्र की पहचान है।

महिला सशक्तिकरण

यद्यपि हम पहले से ही अभाव के उन्मूलन में व्यक्तियों की जाति की स्थिति के बारे में जानकारी की क्षमता के बारे में कुछ कहने की स्थिति में हैं, हम निष्कर्ष निकालने से पहले अपनी जांच को दूसरे क्षेत्र में ले जाते हैं। यह दशकों से जाना जाता है कि भारत में लैंगिक असमानता मौजूद है। हालाँकि, महिलाओं में कम साक्षरता और उच्च शिशु मृत्यु दर के ज्ञान ने लोक नीति का प्रतिकार करने के लिए बहुत काम किया है जो महिला सशक्तिकरण को सुनिश्चित करेगी। हमारे अध्ययन के दो राज्यों में लौटने पर, केरल महिला सशक्तिकरण के मामले में बहुत निराश करता है, और श्रम बल की भागीदारी, महिला विधायकों और न्यायाधीशों के अनुपात और महिलाओं के खिलाफ अपराधों के मामले में तमिलनाडु से पीछे है। जनगणना के माध्यम से महिलाओं की संख्या की गणना करना उनके द्वारा सामना की जाने वाली वंचितता और असमानता को खत्म करने के लिए अपर्याप्त साबित हुआ है। राजनीति न कि सूचना की उपलब्धता लोक नीति को संचालित करती है।

पुलाप्रे बालकृष्णन अशोक विश्वविद्यालय, सोनीपत में पढ़ाते हैं और रोहित उन्नीकृष्णन आईआईएम कोझीकोड में काम करते हैं