कैसे छत्तीसगढ़ ने एक ऐतिहासिक फैसले को अवरुद्ध कर दिया है

सलवा जुडूम का फैसला 10 साल पहले सुनाया गया था, लेकिन इसे लागू करने के लिए कुछ भी नहीं किया गया।

दस साल पहले, 5 जुलाई, 2011 को, जस्टिस बी. सुदर्शन रेड्डी और एस.एस. निज्जर ने सलवा जुडूम पर प्रतिबंध लगाते हुए एक ऐतिहासिक फैसला सुनाया था. सलवा जुडूम 2005 में शुरू किया गया एक आंदोलन था और जिसे छत्तीसगढ़ और केंद्र सरकार द्वारा प्रायोजित किया गया, जोकि जाहिर तौर पर माओवादियों के खिलाफ लड़ने के लिए था। इस फैसले में न्यायाधीशों ने यह भी फैसला सुनाया कि आत्मसमर्पण करने वाले माओवादियों और अप्रशिक्षित ग्रामीणों को विशेष पुलिस अधिकारियों (SPO) के रूप में अग्रिम पंक्ति के उग्रवाद विरोधी अभियानों में इस्तेमाल करना असंवैधानिक है। इसने निर्देश दिया कि मौजूदा SPOs को यातायात प्रबंधन या ऐसे अन्य सुरक्षित कर्तव्यों में फिर से तैनात किया जाए। हालाँकि, विशेष रूप से  मानवाधिकारों के उल्लंघन में शामिल सुरक्षा बलों और अन्य लोगों पर मुकदमा चलाने और हिंसा का शिकार हुए ग्रामीणों के पुनर्वास जैसे अन्य मामलों को लंबित छोड़ दिया गया था, क्योंकि राज्य को इसके लिए व्यापक योजना प्रस्तुत करने के लिए कहा गया था।

दस साल बीत जाने के बाद भी फैसले को लागू करने के लिए कुछ नहीं किया गया। इसके बजाय, राज्य सरकार ने केवल SPOs का नाम बदल दिया है। उन्हें अब जिला रिजर्व गार्ड (DRG) के रूप में जाना जाता है। DRG सदस्यों के साथ बातचीत से पता चला है कि उनमें से ज्यादातर पकड़े गए या आत्मसमर्पण करने वाले माओवादी हैं और पुलिस बल में शामिल होते ही उन्हें स्वचालित हथियार दिए जाते हैं। उनमें से कुछ को एक से तीन महीने तक का प्रशिक्षण भी मिलता है, और कुछ को वह भी नहीं। वे अपने पूर्व ग्रामीण सहयोगियों के खिलाफ सबसे अधिक ज्यादती करते हैं, किसी भी ऑपरेशन में सबसे अधिक हताहत होते हैं, और नियमित सिपाही की तुलना में बहुत कम भुगतान पाते हैं, आदि इन सभी कारणों से न्यायाधीशों ने उनके उपयोग को गैरकानूनी घोषित कर दिया था। 2012 में दायर एक अवमानना ​​याचिका अभी भी सुनवाई का इंतजार कर रही है। हालांकि ‘अंतिम सुनवाई’ दिसंबर 2018 में न्यायमूर्ति मदन लोकुर और न्यायमूर्ति दीपक गुप्ता की एक अन्य पीठ के समक्ष शुरू हुई, इसके तुरंत बाद न्यायाधीश सेवानिवृत्त हो गए और तब से कोई सुनवाई नहीं हुई है।

नए संघर्ष

तब से जमीन पर बहुत कुछ हुआ है। 2005 और 2007 के बीच अपने चरम पर, जुडूम द्वारा ग्रामीणों को सरकार के नियंत्रित शिविरों में जाने को मजबूर करना शामिल था। इनकार करने वालों को उनके गांवों को जलाकर दंडित किया जाता था। इस दौरान सैकड़ों लोग मारे गए और उनकी मौतों को ‘मुठभेड़’ के रूप में भी दर्ज नहीं किया गया। ग्रामीण भागकर पड़ोसी राज्यों या अपने गांवों के आसपास के जंगलों में चले गए। संघम के सदस्य जो सक्रिय लेकिन निहत्थे माओवादियों से सहानुभूति रखने वालें थे, को या तो जेल में डाल दिया गया या सुरक्षा बलों में SPOs के रूप में शामिल होने के लिए मजबूर किया गया।

आज, जुडूम शिविर लगभग खाली हैं और केवल पूर्व एसपीओ और उनके परिवार शेष हैं, जो अब स्थायी घरों में हैं। शिविर में जाने वालों और जंगल में जाने वालों ग्रामीणों के बीच का बंटवारा अब सुलझ गया है। लोग वापस आ गए हैं और कृषि कार्यों को शुरू कर दिया है। एक पूरी पीढ़ी बड़ी हो गई है और जैसा कि हम सिलगर में केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) के शिविर के खिलाफ आंदोलन में देखते हैं, वे अब नए संघर्षों पर उतर आए हैं। पूरे क्षेत्र में,वे ग्रामीण स्कूलों और स्वास्थ्य केंद्रों की मांग कर रहे हैं। पर इसके बजाय, जो उन्हें बहुतायत में मिला है वह है सीआरपीएफ कैंप। इन्हें 5 किमी से भी कम दूरियों पर बनाया गया है. साथ ही, सड़कों पर बुलडोजर चलाया जा रहा है, जो कभी घने जंगल हुआ करते थे। 2007 में इस केस के शुरू होने के बाद से लागू होने वाला एकमात्र सुप्रीम कोर्ट का निर्देश यह है कि सुरक्षा बलों ने उन स्कूलों को खाली कर दिया है जहां वे डेरा डाले हुए थे। लेकिन ऐसा इसलिए है क्योंकि सार्वजनिक भूमि और निजी क्षेत्रों के अपने बड़े अधिग्रहण के साथ, सीआरपीएफ के पास अब इन बर्बाद संरचनाओं के लिए कोई उपयोग नहीं है।

ग्रामीणों ने न्याय पाने के तमाम हथकंडे आजमाए लेकिन नाकाम रहे। ताड़मेटला, तिमापुरम और मोरपल्ली के निवासियों, जिनके गांवों को 2011 में सुरक्षा बलों ने जला दिया था, ने केंद्रीय जांच ब्यूरो के सामने सबूत देने के लिए सैकड़ों किलोमीटर की यात्रा की, जो उनके पक्ष में आया, और कुछ SPOs के खिलाफ आरोप पत्र दायर किया। एक दुर्लभ वाक्या के रूप में, राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने वकील सुधा भारद्वाज द्वारा दायर एक मामले में गांव कोंडासावली में उल्लंघन के लिए सरकार को फटकार लगाई। सरकेगुडा के ग्रामीणों ने, जहां जून 2012 की एक रात में बच्चों सहित 17 निर्दोष लोगों की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी, न्यायिक जांच आयोग के समक्ष गवाही देने में बहुत साहस और दृढ़ता दिखाई। लेकिन इन सभी मामलों में जहां सरकार और सुरक्षा बलों पर इन स्वतंत्र जांच आयोगों द्वारा आरोप लगाया गया, वहां जिम्मेदार लोगों पर मुकदमा चलाने के लिए कोई कदम नहीं उठाया गया.

सुप्रीम कोर्ट में ग्रामीणों की तरफ से नि:शुल्क दलील देने वाले वकील टी.आर. अंध्यारुजिना और अशोक देसाई का निधन हो गया है। और जस्टिस निज्जर भी गुजर चुके हैं। सुश्री भारद्वाज विभिन्न आरोपों के चलते 2018 से जेल में हैं। पांच अन्य लोगों के साथ, मैं पुलिस द्वारा लगाए गए हत्या के झूठे आरोप से बच गया हूं, और यहां तक ​​कि मानसिक आघात के लिए NHRC द्वारा मुआवजा भी दिया गया है, हालांकि हमारा मामला एक अपवाद है। भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) के पूर्व कार्यकर्ता पोडियम पांडा, जिन्होंने न्याय की मांग के लिए ताड़मेटला के ग्रामीणों का समर्थन किया था, को गिरफ्तार किया गया, कथित तौर पर प्रताड़ित किया गया और अब वे एक ‘पुलिस मुखबिर’ हैं। माओवादी उसे या उसकी पत्नी,जो चिंतागुफ़ा की पूर्व सरपंच थी, को गाँव लौटने नहीं देंगे, भले ही चिंतागुफ़ा और आसपास के गाँवों के सभी लोग उनकी वापसी चाहते हों।

वादों को पूरा न करना

2014 में, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की सरकार ने केंद्र में 10 साल पुरानी कांग्रेस सरकार को बदल दिया। 2018 में, छत्तीसगढ़ में 15 साल पुरानी भाजपा सरकार को कांग्रेस सरकार ने बदल दिया। भाजपा और कांग्रेस द्वारा संयुक्त रूप से चलाए जा रहे हिंसक आंदोलन के आदिवासी चेहरे महेंद्र कर्मा को 2013 में माओवादियों ने मारा दिया था। डिमरापाल में मेडिकल कॉलेज अस्पताल का नाम अब उनके नाम पर रखा गया है। एस.आर.पी. कल्लूरी जो बस्तर के पुलिस महानिरीक्षक रह चुके थे, पर कई मानवाधिकारों के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था। उन्हें बस्तर से स्थानांतरित कर दिया गया, लेकिन ताड़मेटला गाँव जलाने के मामले में सीबीआई द्वारा एक आंतरिक रिपोर्ट में उनका नाम होने के बावजूद उन पर कभी मुकदमा नहीं चलाया गया।

2018 में चुनाव लड़ते हुए, कांग्रेस ने उन हजारों निर्दोष ग्रामीणों के बारे में कुछ करने का वादा किया, जिन्हें पुलिस ने संदिग्ध माओवादियों के रूप में गिरफ्तार किया है और बरी होने से पहले लंबे समय तक जेल में रखा था। इन ग्रामीणों के लिए, अपने परिवारों से मिलना मुश्किल है और वकीलों को रखने से उनके अल्प संसाधनों की बर्बादी होती है। भले ही कुछ समर्पित मानवाधिकार वकीलों ने मदद करने की कोशिश की है, लेकिन गिरफ्तारीयों का पैमाना बहुत बड़ा है। फिर भी, COVID-19 के दौरान भी कैदियों को मुक्त करने का सरकार का संकल्प सुरक्षा शिविरों की स्थापना और अधिक लोगों को गिरफ्तार करने के अपने संकल्प के बिल्कुल विपरीत है।

जवानों और माओवादियों के बीच मुठभेड़ों में मौतें समय-समय पर राष्ट्रीय सुर्खियों में रहती हैं। लेकिन ग्रामीणों और माओवादियों की न्यायेतर हत्याएं और माओवादियों द्वारा संदिग्ध मुखबिरों की हत्याएं स्थिर गति से जारी हैं, शायद ही कभी इनको कोई बड़े पैमाने पर उठाता हो। 28 जून को प्रेस को दिए गए एक अनुमान में सरकेगुडा में 2015 और 2021 के बीच फर्जी मुठभेड़ों में 187 मौतों का दावा किया गया था।

कांग्रेस द्वारा किया गया एक और वादा यथा: पत्रकारों को सुरक्षा प्रदान करना, वह भी अंधेरे में है। छत्तीसगढ़ बचाओ आंदोलन और भाकपा के कार्यकर्ताओं को सिलगर और सरकेगुडा तक पहुंचने में जिन कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है, उससे पता चलता है कि कैसे भाजपा की रणनीति अब भी जारी है। ग्रामीणों को बताया गया कि COVID ​​​​-19 प्रतिबंधों का मतलब है कि वे सरकेगुडा नरसंहार की बरसी पर पीड़ितों का शोक नहीं मना सकते, लेकिन एक दिन बाद, प्रशासन ने कांग्रेस विधायक कवासी लखमा के स्वागत के लिए रेड कार्पेट बिछाई और बड़ी भीड़ इक्कठा की।

जब तक दोनों पक्ष शांति वार्ता को लेकर गंभीर नहीं होते, ऐसे ही 10 साल और बीत जाएंगे। 2011 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को और भी अर्थहीन बना दिया जाएगा, और क्या इस समय में न्याय या कानून के शासन का विचार इस जमीन पर कभी संभव भी हो सकेगा।

नंदिनी सुंदर दिल्ली स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में समाजशास्त्र की प्रोफेसर है,और सलवा जुडूम मामले में याचिकाकर्ताओं में से एक हैं।