उच्च शिक्षा और COVID-19

छात्रों और कर्मचारियों के लिए सुरक्षित परिसर बनाने के लिए संस्थानों को वित्तीय सहायता दी जानी चाहिए

भारत में उच्च शिक्षा संस्थानों के परिसरों की स्थिति वर्तमान में अपनी अवनति पर है। COVID-19 महामारी की दूसरी लहर ने पूरे देश को घुटनों पर ला दिया और लोगों को बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंचने के लिए संघर्ष करना पड़ा। लेकिन अभी भी परिसरों की सुरक्षा हेतु गंभीर विचार की कमी है, जो सामुदायिक स्तर पर संक्रमण के प्रसार के लिए सबसे संवेदनशील स्थलों में से एक हो सकता है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC)1 द्वारा शीर्ष स्तर पर और संबंधित शिक्षा विभागों द्वारा राज्य स्तर पर समय-समय पर जारी मानक संचालन प्रक्रियाओं, प्रोटोकॉल या दिशानिर्देशों के लिए अधिसूचना के रूप में नियमित सलाह के अलावा,जमीनी स्तर पर कुछ भी ठोस नहीं किया गया है।

परिसरों जिनमें कक्षाओं और प्रयोगशालाओं के अलावा छात्रावास, पुस्तकालय, कॉमन रूम-कम-वॉशरूम, कैंटीन, ऑडिटोरियम, व्यायामशाला, खेल के मैदान, प्रशासनिक कार्यालय, स्टाफ रूम, गेस्ट हाउस और स्टाफ क्वार्टर हैं उनको COVID-19 हेतु उपयुक्त व्यवहार के लिए अपनी वर्तमान सेटिंग्स को बदलने और संशोधित करने के लिए संसाधनों की आवश्यकता होगी। ‘हमेशा की तरह ही चलने वाला’ दृष्टिकोण अपनाने से छात्रों और कर्मचारियों दोनों के जीवन को जोखिम में डालेगा। इस साल 10 मई को, UGC ने COVID-19 संकट से लड़ने के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों को अपनाए जाने वाले कई उपायों का सुझाव दिया। इसने अन्य बातों के साथ-साथ एक टास्क फोर्स का गठन करने और हेल्पलाइन स्थापित करने, मानसिक स्वास्थ्य सहायता प्रदान करने और सभी हितधारकों की भलाई को सक्षम करने के लिए परामर्शदाताओं और सलाहकारों को शामिल करने और NCC और NSS सहित जीवन कौशल में प्रशिक्षित अच्छी तरह से सूचित स्वयंसेवकों की एक टीम बनाने की सिफारिश की। हालांकि, इसने इन विशिष्ट कार्यों के लिए कार्यबल को प्रशिक्षित करने के साधनों और तंत्रों का उल्लेख नहीं किया। इसके अभाव में ऐसे उपाय मात्र खोखले प्रयास ही रह जाते हैं।

आदेशों की अधिकता

उच्च शिक्षा संस्थानों, विशेष रूप से राज्य द्वारा संचालित विश्वविद्यालयों की खराब वित्तीय स्थिति, टीकाकरण अभियान से पहले से ही दबावग्रस्त राज्य सरकारों की ओर से इच्छाशक्ति की कमी ने स्थिति को और गंभीर बना दिया है। प्रमुख विश्वविद्यालयों में कई शिक्षकों की मृत्यु की रिपोर्ट राष्ट्रीय बौद्धिक पूंजी और छात्रहित के नुकसान को उजागर करती है।

यूजीसी ने पिछले साल 5 नवंबर को अपने आदेश में कॉलेजों को लॉकडाउन के बाद फिर से खोलने के लिए दिशानिर्देश सूचीबद्ध किए थे। इसने सिफारिश की कि राज्य सरकारें उच्च शिक्षा संस्थानों के परामर्श से अपने प्रत्येक जिले और क्षेत्रों में आवश्यक वस्तुओं, जैसे कि सेनेटाइज़र और फेस मास्क की खरीद का अनुमान लगाएं और उनको उपलब्ध करें; इसने उन्हें वितरण के लिए एक योजना तैयार करने के लिए भी कहा। विश्वविद्यालयों और कॉलेजों को निर्देश दिया गया था कि वे छात्रों, शिक्षकों और कर्मचारियों को इन वस्तुओं की पर्याप्त आपूर्ति सुनिश्चित करें। यूजीसी ने यह भी सुझाव दिया कि उच्च शिक्षा संस्थान लक्षण युक्त व्यक्तियों के अलगाव और संक्रमित व्यक्तियों के संपर्क में आने वालों के लिए क्वारंटाइन सुविधाएं  परिसर में स्थापित करें। वैकल्पिक रूप से, वे राज्य द्वारा संचालित अस्पतालों या अन्य अनुमोदित परिसरों के साथ गठजोड़ कर सकते हैं, जैसा कि स्थानीय अधिकारियों द्वारा सुझाया गया है, ताकि क्वारंटाइन या आइसोलेशन वाले व्यक्तियों को आवश्यक चीजें उपलब्ध कराई जा सकें।

त्वरित कार्रवाई की आवश्यकता

लेकिन ये उपाय हकीकत से कोसों दूर हैं। COVID-19 प्रबंधन के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों के लिए स्पष्ट बजटीय आवंटन राज्यों के वार्षिक बजट में गायब पाया गया। संस्थानों और नीति निर्माताओं (केंद्र और राज्य दोनों स्तरों पर) की ओर से यह उदासीनता जीवन को खतरे में डाल सकती है और आने वाले समय में शैक्षणिक गतिविधियों को पूरी तरह से बंद कर सकती है।

यह यूजीसी पर निर्भर है कि वह राज्य सरकारों को कोविड-19 संकट के प्रबंधन के लिए उच्च शिक्षा संस्थानों को उदारतापूर्वक वित्तीय सहायता प्रदान करने का निर्देश दे। संसाधन वर्ष 2021-22 के लिए राज्य आपदा प्रतिक्रिया कोष (SDRF) से आ सकते हैं, जिसे असाधारण सार्वजनिक स्वास्थ्य संकट को देखते हुए सामान्य समय से बहुत पहले गृह मंत्रालय की सिफारिश पर व्यय विभाग द्वारा जारी किया गया था।

मिलिंद कुमार शर्मा उत्पादन और औद्योगिक इंजीनियरिंग विभाग, M.B.M इंजीनियरिंग कॉलेज, जय नारायण व्यास विश्वविद्यालय, जोधपुर में पढ़ाते हैं।

सम्बंधित संदर्भ:

  1. भारत का विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (University Grants Commission, UGC) केन्द्रीय सरकार का एक आयोग है जो विश्वविद्यालयों को मान्यता देता है। यही आयोग सरकार द्वारा मान्यता प्राप्त विश्वविद्यालयों एवं महाविद्यालयों को अनुदान भी प्रदान करता है। इसका मुख्यालय नयी दिल्ली में है और इसके छः क्षेत्रीय कार्यालय पुणे, भोपाल, कोलकाता, हैदराबाद, गुवाहाटी एवं बंगलुरु में हैं। भारतीय स्वतंत्रता के उपरांत 1948 में डॉ॰ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की अध्यक्षता में यूनिवर्सिटी एजुकेशन कमीशन की नींव रखी गई। इसके अंतर्गत देश में शिक्षा की आवश्यकताओं और उनमें सुधार पर काम किए जाने पर विचार किया जाता था। इस आयोग ने सलाह दी कि आजादी पूर्व के यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमिटी को फिर से गठित किया जाए। उसका एक अध्यक्ष हो और उसके साथ ही देश के बड़े शिक्षाविदों को भी इस समिति के साथ जोड़ा जाए।

सन् 1952 में सरकार ने निर्णल लिया कि केंद्रीय और अन्य उच्च शिक्षा संस्थानों को दी जाने वाले वित्तीय सहयोग के मामलों को यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अधीन लाया जाएगा। इस तरह 28 दिसंबर 1953 को तत्कालीन शिक्षा मंत्री मौलाना अबुल कलाम आजाद ने औपचारिक तौर पर यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन की नींव रखी थी। इसके बाद हालांकि 1956 में जाकर ही यूजीसी को संसद में पारित एक विशेष विधेयक के बाद सरकार के अधीन लाया गया और तभी औपचारिक तौर पर इसे स्थापित माना गया.