चंपारण सत्याग्रह

BPSC मुख्य परीक्षा के दृष्टिकोण से चंपारण सत्याग्रह बहुत महत्वपूर्ण टोपिक है और अमूमन यह सवाल कुछ वर्षों के अंतराल में पूछा जाता है साथ ही इससे संबंधित कुछ तथ्य प्रारम्भिक परीक्षा के लिए भी बहुत महत्वपूर्ण रहा है| मैं यहाँ पर चंपारण सत्याग्रह से संबंधित कुछ तथ्य की व्याख्या करूँगा जो आपके लिये इस बात में सहायक सिद्ध होगा की चंपारण सत्याग्रह के क्या कारण थे? इसके क्या परिणाम सामने आए? भारतीय स्वतंत्रता संग्राम पर इस सत्याग्रह का क्या प्रभाव पड़ा? महात्मा गाँधी के भारत में सत्याग्रह का यह पहला प्रयोग कैसे था? भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस पर इसका क्या प्रभाव पड़ा? और बिहार के किसान आन्दोलन का यह किस प्रकार प्रेरणा एवं उर्जा का स्रोत बन पाया?

देश के अन्य भागों की तरह चंपारण के किसान भी ब्रिटिश सरकार के शोषण चक्र में फंसी हुई थी| 19वीं सदी की शुरुआत में ही यूरोपीय बागान मालिकों ने किसानों से एक अनुबंध करा लिया था, जिसके अनुसार किसानों को अपनी जमीन के 3/20वें हिस्से में नील की खेती करना अनिवार्य था| इसे ‘तीनकठिया’ पद्धति कहते थे|

19वीं सदी के अंत आते-आते बाजार में जर्मनी के रासायनिक रंग नील की मांग पर हावी हो गया और अंततः यूरोपीय बागान मालिक नील की खेती बंद करने पर विवश हो गये साथ ही किसान भी नील की खेती अनुबंध के भय से मज़बूरी में करते थे| बागान मालिकों ने किसानों की मज़बूरी का फायदा उठाने के लिए अनुबंध से मुक्त करने हेतु लगान एवं अन्य गैरक़ानूनी शुल्क मनमाने ढंग से बढ़ा दिया था| 1917 से पहले 1908 में भी इस प्रथा का विरोध काफी मुखर हुआ था परंतु यूरोपीय बागान मालिकों का शोषण जारी रहा |

1915 के जनवरी में महात्मा गाँधी दक्षिण अफ्रीका से स्वदेश वापस लौटे थे एवं देश भर में, अपनी सक्रिय भागीदारी से पहले, दौरा कर रहे थे| इसी क्रम में गाँधी जी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दिसम्बर 1916 के वार्षिक अधिवेशन में लखनऊ आये हुए थे, यहीं चंपारण के एक किसान राजकुमार शुक्ल ने गाँधी जी को चंपारण के किसानों की व्यथा सुनाई एवं चंपारण आकर किसानों की दशा देखने के लिए निमंत्रण दिए| गाँधी जी राजकुमार शुक्ल के निमन्त्रण को स्वीकार कर अप्रैल 1917 में चंपारण पहुंचे|

अपने 1915 के स्वदेश वापसी के बाद यह पहला अवसर था जब गाँधी जी ने किसी आन्दोलन में शरीक होना स्वीकार किया था| गाँधी जी के चंपारण पहुँचते ही प्रशासन सजग हो गई और गाँधी जी को वहां के कमिश्नर ने वहां से तुरंत चले जाने का आदेश जारी किया| गाँधी जी ने इस आदेश को मानने से इनकार कर दिया और इसके लिए किसी भी दंड को भुगतने का निर्णय किया| ब्रिटिश इस मुद्दे को अधिक तूल नहीं देना चाहती थी इसलिए प्रशासन ने अपना आदेश वापस लिया एवं गांधीजी को चंपारण के गांवों में जाने की छुट दे दी गई| गाँधी जी के लिए यह पहली जीत थी| शांतिपूर्ण तरीके से सरकारी आदेश की अवज्ञा की विधि ने जनमानस पर चमत्कार जैसा प्रभाव छोड़ा| इसी विधी को सत्याग्रह के रूप में परिभाषित किया जाता है| गाँधी जी इस विधी का प्रयोग अफ्रीका में सफलतापूर्वक  कर चुके थे और चंपारण की भूमि भारत में सत्याग्रह के पहले प्रयोग स्थली के रूप में दर्ज हो गया|

गाँधी जी किसी भी मुद्दे में तब तक हस्तक्षेप नहीं करते थे जब तक की वह उनकी वास्तविक स्थितियों का अध्धयन न कर लिए हों| अतः गाँधी जी ने इस कार्य हेतु अपने सहयोगियों जिसमें – ब्रज किशोर, राजेन्द्र प्रसाद, महादेव देसाई, नरहरि पारेख, जे. बी. कृपलानी, मजहरुल हक़ आदि थे,  के साथ गाँव-गाँव घूम कर किसानों से उनकी समस्या को सुनते थे एवं जब उन्हें भरोसा हो जाता था कि सब ठीक है फिर वह उनकी समस्या को लिपिबद्ध करते थे| इस प्रकार 800 किसानों का बयान वे दर्ज कर चुके थे| बिहार के उपराज्यपाल एडवर्ड गेट ने गाँधी जी को चर्चा के लिए आमन्त्रण दिया एवं किसानों की समस्या के समाधान के लिए एक चंपारण किसान समिति का गठन किया जिसमें गाँधी जी को भी एक सदस्य के रूप में शामिल किया गया| गाँधी जी को समिति को यह समझाने में समय नहीं लगा की किसानों का किस प्रकार से शोषण किया गया है और उनसे गैर-वैधानिक शुल्क की वसूली की गई है| अतः किसानों को इस एवज में हर्जाना दिया जाए| समिति गाँधी जी के तर्कों से सहमत हुई एवं बागान मालिक अवैध वसूली के 25% तक के हर्जाने को वापस लौटने के लिए तैयार हो गये साथ ही चंपारण कृषि अधिनियम के माध्यम से तीन कठिया पद्धति को भी समाप्त कर दिया गया| गाँधी जी का मानना था की 25% हर्जाने के रूप में वापसी देने पर भी यूरोपीय बागान मालिक शर्मिंदा होंगे और यह हमारी जीत होगी| अन्ततः गांधीजी का भारत में सत्याग्रह का पहला प्रयोग सफल रहा और एक दशक के भीतर ही यूरोपीय बागान मालिक चंपारण छोड़ कर चले गये|

चंपारण सत्याग्रह की सफलता देश में गाँधी एवं गांधीवाद की शुरुआत थी| इसने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के दो धरों नरम दल और गरम दल को एक कर दिया| गाँधी जी की शांति पूर्ण नीति जहाँ नरम दल को अनुकूल लगती थी थी तो खुलेआम बहिष्कार की नीति गरम दल को आकर्षित करती थी| इसी सत्याग्रह की बुनियाद पर भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम अपने लक्ष्य तक पहुँच सकी| इसी आन्दोलन से प्रेरित होकर स्वामी विद्यानंद नें दरभंगा महाराज के खिलाफ 1919 में किसान आन्दोलन चलाये| 1928 में स्वामी सहजानंद सरस्वती के नेतृत्व में किसान सभा का गठन किया गया एवं आगे चलकर 1936 में अखिल भारतीय किसान सभा का गठन किया गया| जिसके अध्यक्ष स्वामी सहजानन्द सरस्वती थे तो महासचिव   प्रोफेसर एन. जी. रंगा थे| गांधीजी का यह प्रयोग एक प्रकार से भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में रणनीतिक परिवर्तन का द्योतक है जिसने यह साबित किया कि हम शांतिपूर्ण तरीके से भी अपने उद्देश्य की प्राप्ति कर सकते हैं| कुल मिलाकर यह सत्याग्रह देश के अन्य भागों में होने वाली आन्दोलन के लिए उर्जास्रोत की तरह साबित हुआ|

(कुँवर आईंस्टीन)

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