बिहार की वास्तुकला एवं चित्रकला

मौर्यकला एवं स्थापत्य :

  1. (क) मौर्यकालीन वास्तुकला

मौर्ययुग में कला के दो रूप मिलते हैं।

  1. राजकीय आश्रय प्राप्त वास्तु एवं मूर्ति कला तथा
  2. उपर्युक्त दोनों क्षेत्रों में प्राप्त लोक कला।

राजाओं द्वारा संपोषित वास्तुकला राजकीय कला है; जैसे-मार्य प्रसाद, अशोक स्तंभों तथा गुफाओं में प्राप्त होने वाली वास्तुकला।

लोक कला के रूप में परखम के यक्ष, पटना से प्राप्त मूर्ति, दीदारगंज से प्राप्त चापरग्रहिनि, वेसनगर की यक्षिनी आदि में दिखाई पड़ती है। इन कलाकृतियों को पाषाणों के माध्यम से अभिव्यक्त किया गया है।

राजकीय प्रश्रय प्राप्त वास्तुकला:

राजकीय प्रश्रय प्राप्त वास्तु एवं मूर्तिकला का सबसे उत्कृष्ट उदाहरण मगध सम्राट चंद्रगुप्त का राजप्रसाद है; जिसका विस्तृत वर्णन एरियन ने किया है। उन्होंने लिखा है कि चंद्रगुप्त के राज-प्रसाद की शानो-शौकत का मुकाबला न तो सूसा और न तो इकबताना ही कर सकते है। कुम्हारा (पटना) में स्थित सभाभवन के अवशेष से इसकी विशालता का अंदाजात लगाया जा सकता है। यह सभाभवन अनेक खंभों वाला एक विशाल हाॅल था, जिनमें 84 पाषाण स्तंभ पाए गए हैं। इस सभा भवन की छत एवं फर्श लकडी की बनी हुई थी। सभा भवन 140 फुट लंबा और 120 फुट चैड़ा था। फाहियान ने इसे देव निर्मित माना है क्योंकि उसे विश्वास ही नहीं हुआ कि यह मानव निर्मित भी हो सकता है। पतंजलि ने भी पाटलिपुत्र के विशाल भवनों के बारे में विशेषकर सय्रात के राजमहल तथा नगर की ऊंची दीवारों की प्रशंसा की है। मेगास्थनिज ने लिखा है कि नगर के चारो और लकड़ी की दीवार (प्राचीर) बनी हुई थी, जिसके बीच-बीच में तीर चलाने के लिए छिद्र बने हुए थे। प्राचीर के चारों और एक 60 फूट गहरी और 600 फुट चैड़ी खाई बनाई गई थी। नगर में आने जाने के लिए 64 द्वार थे।

(ख) मार्यकालीन पाषाण स्तंभ

मोर्यकालीन वास्तुकला के उत्कृष्ट उदाहरणों के रूप में सम्राट अशोक के शिलास्तंभ, उसके शिलोभाग  एवं पाषाण मूर्तिया विशेषकर महत्वपूर्ण हैं। ये स्तंभ गोलाकार, 20 फीट से भी अधिक लंबे एवं एक ही पत्थर से निर्मित हैं। ये स्तंभ नीचे मोटे तथा शीर्ष भाग की ओर क्रमशः पतले होते चले गये हैं। प्रत्येक स्तंभ का भार 50 टन है और अधिकतम लंबाई 50 फीट है। ये भारत के विभिन्न भागों से प्राप्त हुए हैं। स्तंभ के शिरोभाग में उल्टे कमल के फूल का चित्र है और उसके ऊपर वर्गाकार या चतुर्भजाकर चबूतरा है। इस चबूतरे पर पशु की मूर्ति उत्कीर्ण हैं। उल्टे कमल के चित्र से लेकर पशु की मूर्ति सभी एक ही पत्थर के बने हुए हैं।

अशोककालीन पाषाण स्तंभों को तीन भागों में बांटा जा सकता है:

(i)  स्तंभ का भूमिगत भाग

(ii) स्तंभ के मध्य का भाग एवं

(iii) स्तंभ का शीर्ष भाग

स्तंभ का भूमिगत भाग मयूर की आकृति से युक्त है। चमकदार पाॅलिश इन भूमिगत स्तंभों के उस भाग पर भी जो कि भूमि में गड़े हुए हैं। स्तंभ का मध्य भाग चुना के लाल पत्थरों द्वारा निर्मित किया जाता था। इस भाग पर भी चमकदार पाॅलिस है। स्तंभ का शीर्ष भाग सर्वाधिक कला युक्त है। शीर्ष भाग पर भिन्न-भिन्न पशुओं की आकृतियां है, जैसे-हंस, सिंह, हाथी, बैल इत्यादि। मार्यकालीन पाषाण स्तंभों में संभवतः प्राचीनतम वैशाली के निकट स्थित बसाढ बरवीरा का स्तंभ है। यह आज भी पूर्णतः खड़ा है तथा इस पर कोई अभिलेख उत्कीर्ण नहीं है। अन्य स्तंभों की तुलना में इसमें वैसी सुगढ़ता नहीं  है। इसके उल्टे कमल के शिरोभाग पर एक विस्तृत चबूतरा है। इस विशाल चबूतरे पर सिंह के पीछे के पैरों को संकुचित कर बैठा हुआ है।

(ग.) महत्वपूर्ण पाषाण स्तंभ

लोरिया नंदनगढ़ से प्राप्त पाषाण-स्तंभो में सुंदरतम है। इसकी गोल चैकी पर गर्दन उठाए सिंह अगले पैरों पर खड़ा हुआ है। आसन के चारों और किनारों पर हंस उत्कीर्ण है। ये हंस सजीव एवं सुंदर है। लोरिया नंदनगढ़ के समीप रामपुरवा में भी अशोक के शिलास्तंभ, पशु प्रतिमा और स्तंभ से युक्त शीर्ष भाग प्राप्तु हुए है।

सम्राट अशोक के द्वार निर्मित पाषाण स्तंभों में से कुछ में धर्म की शिक्षाएं उत्कीर्ण की गई हैं। इनमें मुख्य हैं:

(i) दिल्ली का टोपरा का पाषण स्तंभ

(ii) दिल्ली में मेरठ का पाषण स्तंभ

(iii) इलाहाबाद का पाषाण स्तंभ एवं

(iv) लौरिया अरेराज का पाषण स्तंभ

दिल्ली का टोपरा का स्तंभ फिरोजशाह कल लाट के नाम से प्रसिद्ध है। पहले यह पाषाण स्तंभ दिल्ली स 90 मील दूर अम्बाला जिले में यमुना नदी के किनारे टोपड़ा में पड़ा था। बादशाह (फिरोजशाह) तुगलक इसे दिल्ली ले आया था। दिल्ली में मेरठ का पाषण स्तंभ इसे भी बादशाह फिरोजशाह तुगलग मेरठ से उठावाकर दिल्ली लाया था-बादशाह फर्रूखशियर के समय (1713-19 ई.) उसके बारुदखाने मे आग लग जाने के कारण यह स्तंभ गिरकर ध्वस्त हो गया था। किंतु बाद में इसी ध्वस्त स्तंभ को पुनः प्रतिष्ठित किया गया। इलाहाबाद के पाषण स्तंभों पर अशोक के दो लेख उत्कीर्ण हैं। इस पर सम्राट चंद्रगुप्त की प्रशस्ति भी उत्कीर्ण की गई है। बिहार के चम्पारण जिले में अरेराज महादेव का मंदिर है। इसी के निकट लौरिया में लौरिया अरैराज का पाषाण स्तंभ खड़ा है। इस पर सम्राट अशोक के संदेश उत्कीर्ण हैं।

नेपाल में स्थित रुकमिनदेई पाषाण स्तंभ लेख छोटा होने पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। इस लेख के द्वारा ज्ञात होता है कि यहां भगवान बुद्ध का जन्म हुआ था। इस प्रकार बुद्ध की जन्मस्थली के निर्णय में अभिलेख महत्वपूर्ण साधन है। रुकमिनदेई के पाषाण स्तंभ के उत्तर पश्चिम में 13 मील दूर निग्लीव झील से सटे स्थित निग्लीव ग्राम में निग्लीव पाषाण स्तंभ है। इस पर उत्कीर्ण लेख में सम्राट अशोक कनकमुनि बुद्ध के स्तूप की मरम्मत कराने के संकेत है।

मोर्यकालीन स्थापत्य कला का सर्वोत्तम उदाहरण सारनाथ में चार सिंहों से युक्त स्तंभ का शिरोभाग है। इस शीर्ष पर चार सटकर बैठे हुए सिंहों के मुखों की प्रतिमा है। सिंहों के मुख पर परस्पर विपरीत दिशाओं में है; किंतु उसकी पीठ परस्पर इस प्रकार सटी हुई है कि मानो वे एक ही हों। सिद्धों के मध्य में एक चत्र स्थित है, जो धर्मचक्रम का सूचक हैं। सिंहों के नीचे छोटे-छोटे चक्र हैं। इन पर हाथी, घोड़ा, बैल तथा सिंह की आकृतियां है। इन सबको चलती हुई अवस्था में दिखाया गया है। यह आसन उल्टे कमल के फूल पर स्थित है। सारनाथ के एक पाषाण स्तंभ पर अशोक का लघु लेख उत्कीर्ण है, जिसमें बौद्ध संघ में फूट डालने वालों को कठोर दंड देने का विधान अंकित है।

बेसनगर का पाषाण स्तंभ एक धार्मिक स्तंभ है। इसका निर्माण ग्रीम राजदूर होलियोदोरस द्वारा करवाया गया था। वह परम बैष्णव था। यह पाषाण स्तंभ ई. पूर्व द्वितीय शताब्दी में वासुदेव के नाम पर गरूड़ स्तंभ के रूप में खड़ा किया गया था।

(घ.) मौर्यकालीन पाषाणी गुफाएं

मौर्यकालीन स्थापत्य कला का महत्वपूर्ण उदाहरण पर्वतों को काटकर बनायी गयी पाषाणी गुफाएं हैं। बौद्ध भिक्षुओं के रहने के लिए सम्राट अशोक एवं उनके पौत्र दशरथ ने उनका निर्माण करवाया था। गया जिले में तीन गुफाएं नागार्जुनी पर्वत पर और चार गुफाएं बाराबर पर्वत पर है, ये पत्थरों को काटकर बनाई गई है। यद्यपि कि सभी गुफाएं सादी हैं, फिर भी इनकी चमक सराहनीय है। इन गुफाओं से सम्राट अशोक और उनके पौत्र दशरथ के अभिलेख भी प्राप्त हुए हैं। इन गुफाओं के निर्माण में लकड़ी के कार्य की स्पष्ट नकल दृष्टिगत होती है। गुफाओं के द्वार लकड़ी के बने हुए हैं।

अशोककालीन गुफाओं में सबसे प्राचीन सुदामा गुफा है। इसमें अशोक का अभिलेख भी प्राप्त होता है। अभिलेख से ज्ञात होता है कि अशोक ने अपने राज्याभिषेक के 12वें वर्ष में आजीवक भिक्षुओं को यह गुफा समर्पित कर दी थी। यह गुफा दो कमरों वाली है। एक बड़ा चतुर्भुजाकर कमरा है जिसकी छत बेलन के आकार की है। बाहर के कमरे से अंदर के वृत्ताकार कमरे में जाया जा सकता है। द्वार लकड़ी के बने हुए हैं।

कर्णचौपाल गुफा सम्राट अशोक ने अपने शासन काल के 19वें वर्ष में बनवायी थी। यह एक आयातकार कमरा है, जिसकी छत मेहरावदार है।

नागार्जुनी पर्वत पर तीन गुफाएं हैं। इन गुफाओं में मौर्य सम्राट दशरथ के लेख उत्कीर्ण है। इनमें से देा तो छोटे कमरे हैं और दोनों की छते मेहराबदार गुंबद के आकार की हैं। तीसरी गुफा एक लंबा हॉल है, जो आयताकार है। इसकी छत भी मेहराबदार है। इस गुफा का नाम गोपी गुफा है।

लोमेश ऋषि की गुफा प्रसिद्ध एवं श्रेष्ठतम है। इस गुफा में कोई भी अभिलेख नहीं है, परंतु दीवारों की चमक मौर्यकालीन है। सुदामा गुफा की तरह की होते हुए भी इसके अंदर की कोठरी गोलाकार नहीं है, बल्कि अंडकार है। इस गुफा के प्रवेश द्वार पर हाथियों द्वारा स्तूप पूजा का दृश्य प्रशंसनीय है। मेहराब में जमीदारी का कार्य सराहनीय है।

सम्राट अशोक ने सांची और भरहुत के स्तूपों का निर्माण करवाकर स्तूप निर्माण की परंपरा को प्रोत्साहित किया था।

(ड़) मोर्यकालीन मूर्तिकला

मौर्यकाल में निर्मित अनेक मूर्तिया भी प्राप्त हुई हैं। प्राप्त मुर्तियों में सर्वाधिक प्रसिद्ध मूर्ति आगरा-मथुरा के मध्य स्थित परखम ग्राम में मिली यक्ष की मूर्ति है। इस मूर्ति की ऊँचाई 7 फुट है। यह मूर्ति भूरे बलुए पत्थर की बनी हुई है। इस मूर्ति का मुख तथा भुजाएं खंडित हैं। यह मूर्ति मौर्यकाल की वेश-भूषा को धारण किए हुए हैं। मौर्यकाल की दूसरी मूर्ति बेसनगर में मिली यक्षिणी की मूर्ति है। इसकी ऊँचाई 6 फुट 7 इंच है। इसकी भुजा तथा मुख टूटे हुए है।

पटना से प्राप्त मूर्तियां परखम ग्राम में मिली मूर्ति से साम्य रखती है। एक मूर्ति पर सिर नहीं है। संभवतः वह टूट गई हे अथवा तोड़ डाली गई है। उसकी गर्दन में कई लड़ियों की माला विद्यमान है। भुजाओं में वलय है। धोती लुंगी की भांति है। शरीर पर चादर है जो दाहिनी भुजा के नीचे से बांये कंधे के ऊपर से होती हुई पीछे लटक रही है। मूर्तियों के पैर लंबे तथा भारी भरकम है, अतः कुछ बेडौल लगते हैं। पैरो की अंगुलियों में स्वभाविकता नहीं है। इनकी पोलिश चमकदार है। इनके शरीर के अलगे भाग की प्रस्तुति पर अधिक ध्यान केंद्रित किया गया है। पुरात्तवेत्ता डॉ. काशी प्रसाद जायसवाल ने उन्हें आजतशत्रु और उदयन की मूर्तियां बताया है जबकि अधिकांश इतिहासकार इन्हें अज्ञात यक्षों की मूर्तियां मानते हैं।

पटना के दीदारगंज से प्राप्त एक मूर्ति पर साढे पांच फूट ऊँची है और एक चैकी पर खड़ी है। चैकी के साथ ही संपूर्ण मूर्ति बलुए पत्थर से निर्मित है, जिस पर विशेष चमक है। मूर्ति का मुखमंउल गोलाकार है, रोमांच शरीर भरा हुआ तथा होठों पर हल्की मुस्कान फैली हुई है।

उदर की नसें, सलवटें, मांसल देह में स्पष्ट दीखती है। मूर्ति के दाहिने हाथ में चंवर है, सर की लटें गुंथी हुई है, हाथों की कलाइयों में चूड़ियां तथा भरी कड़े है, एक हाथ टूटा हुआ है, गले में मुक्ताहार है, जो वस्त्र के मध्यम दोलायन है। इस नारी मूर्ति के स्तन अत्यंत उन्नत, कटि क्षीण एवं नितंब भारी है। इसकी आंखे तिरछी, अंग-प्रत्यंग भरे हुए तथा चेष्टाएं तलालु है। इस प्रकार यह मूर्ति अत्यंत सजीव है और इसमें नारी सौंदर्य की स्वभाविक अभिव्यक्ति देखने को मिलती है। कुछ इतिहासकारों का मानना है कि यह किसी स्त्री-विशेष की मूर्ति नहीं है, बल्कि नारी के शरीर के सौंदर्य की एक सहज काल्पनिक प्रस्तुति भर है।

पटना में जैने तीर्थकर की नग्नमूर्ति भी मिली है, जिसके हाथ नहीं है एवं पैर जंघा के पास से टूटे हुए हैं। इस मूर्ति पर चमकदार पोलिश है। मूर्ति का पुष्ट वक्षस्थल क्षीण तथा शरीर तपस्याकालीन किसी जैन तिर्थकंर का सूचक है।

मौर्यकालीन अनेक मूर्तियां, कुम्हार, तक्षशिला, भीटा, काशी, मथुरा, अहिरच्छत्र, कौशांबी आदि स्थानों से मिली है। पटना से मिटी की मूर्तिया भी मिली है। मूर्तियों के साथ दर्शाए गए खिलौने विशेष महत्वपूर्ण है। ये बुलंदीबाग, कुम्हार, ब्रसाढ, बक्सर आदि स्थानों से विशेष रूप से प्राप्त हुए हैं। बुलंदीबाग से एक नारी मूर्ति मिली है, जो खड़ी एवं आकृति से लंबी है। यह गतिमान है। इसके हाथ में डमरू है और इसने लहंगा धारण कर रखा है। एक अन्य मूर्ति भी मिली है, जिसका शीश पर विचित्र शिरस्त्राण है। यह झालदार घांघरा धारण की हुई है। इसकी कटि क्षीण है, जो कसकर बंधी हुई है। बुलंदीबाग से मिट्टी के एक हंसते हुए बालक का शिरोभाग मिला है। इसकी भोली-भाली हंसी मनमोहक है। इसकी अधिकांश मूर्तियों का संबंध जन-जीवन के विभिन्न रूपों से जुड़ा हुआ है।

मौर्यकालीन मूर्तिकला के सर्वोत्तम नमूने अशोक स्तंभों में दिखलाई पड़ते हैं, जो विभिन्न पशुओं की आकृति में दर्शनीय है। सारनाथ के स्तंभ के शीर्ष भाग में सिंह की मूर्ति भारतवर्ष की मूर्ति की परंपरा में अनुपम एवं अद्वितीय है। इसकी यर्थाथता, शालीनता एवं शांत मुद्रा अशोक की जीवन नीति के अनुरूप है। उड़ीसा की धौली चट्टान को काटर बनायी गयी हार्थी की आकृति पाषाण मूर्तिकला को उत्कृष्टता को सूचित करती है। यह हाथी विशाल आकृति का है, जिसके अग्र भाग को उकेरा गया है। इसकी सूढ, पैर आदि का गइन अत्यंत स्वाभाविक है। ऐसा प्रतीत होता है कि मानो यह अपनी सूंढ से किसी वस्तु को लपेट कर उठा रहा है। हाथी चट्टान से बाहर निकलता हुआ सा प्रतीत होता है। मौर्यकालीन यक्ष यक्षिणी की मूर्तियों के आधार पर कालांतर में बुद्ध, बोधिसत्व तथा जैन तीर्थंकरों की विशाल मूर्तियों का निर्माण किया गया। ये मूर्तियां लोक धर्म का प्रमुख आधार थी। इन्हें सर्वत्र देवी-देवताओं के रूप में पूजा जाता था।

कुछ विद्वान मौर्यकालीन मूर्तियां पर विदेशी प्रभाव को स्वीकार करते हैं और वे ये तर्क प्रस्तुत करते हैं कि

(i) मौर्य साम्राज्य की स्थापना के दो-ढाई सौ वर्ष पूर्व इरान में  आर्कमेनिया वंश का राज्य स्थापित हो चुका था। इसने संरक्षण में मूर्तिकला की अत्यधिक उन्नति हुई। प्राचीन इरानी कलाकारों ने पत्थरों के बने विशाल राजभवनों का निर्माण किया।

(ii) सूसा, पार्लियोलिस तथा इकबातना के सुंदर भवनों की प्रशंसा यूनानी विजेताओं ने मुक्त कण्ठ से की है। पुरात्व विज्ञान ने भी इसकी पुष्टि की है।

(iii) सम्राट अशोक के अभिलेखों की शैली और सम्राट द्वारा के अभिलेखों की शैली एक ही है।

(iv) अशोक का उल्टे कमल द्वारा स्तंभ का शिरोभाग ईरान के घंटीनुमा स्तंभ के आधार से इतना मिलता जुलता है कि कुछ समय पहले मौर्यकालीन स्तंभों के शीर्ष भाग को पर्सिया का घंटीनुमा शिरोभाग ही माना जाता था।

(v) पार्सिया के राजभवन में बड़े-बड़े हाॅल थे, जिनकी छत पाषाण स्तंभों पर टिकी हुई थी। इन्हीं जिनकी छात पाषाण स्तंभों पर टिकी हुई थी। इन्हीं तथ्यों को ध्यान में रखकर सम्राट अशोक ने स्वतंत्र खड़े स्तंभों का निर्माण कराया होगा। कुम्हारार में 80 स्तंभों वाला विशाल भवन है अवशेष ईरानी वास्तुकाला की प्ररेणा की अभिव्यक्ति माने गये हैं।

(vi) मौर्यकालीन पाषाण स्तंभों पर आइने सी चमक है जो आर्कमेनियन राज भवनों पर भी मिलती है।

वस्तुतः मौर्य मूर्तिकला पर युनानी प्रभाव को अस्वीकार नहीं किया जा सकता है, परंतु वह प्रभाव प्रत्यक्ष न होकर इरानी या असीलिन वास्तुकला के माध्यम से अधिक हो सका है। मौर्यकाल भारतीय मूर्तिकला के इतिहास में युग प्रवर्तक माना जाता है। भारतीय मूर्तिकला का इतिहास वास्तविक रूप से इसी युग से प्रारंभ होता है।

 

(कुँवर आईंस्टीन)

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