‘फॉरेवर वॉर’ में अमेरिका की गलतियाँ

अमेरिका ने अफगानिस्तान की परिस्थितियों को गलत तरीके से आँका और लंबे चले युद्ध ने अब तालिबान के प्रभाव को चरम पर पहुंचा दिया है।

राष्ट्रपति जो बिडेन ने सभी अमेरिकी सैनिकों के लिए अफगानिस्तान छोड़ने के लिए 11 सितंबर की समय सीमा निर्धारित की है। यह संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा तालिबान पर आक्रमण के 20 साल बाद ऐसा हो रहा है। सैन्य अधिकारियों का कहना है कि वापसी तय समय से करीब दो महीने पहले पूरी हो जाएगी। पिछले साल दोहा में शुरू हुई अफगान सरकार और तालिबान के बीच शांति वार्ता महीनों से रुकी हुई है। युद्धरत पक्षों के बीच इस्तांबुल में शिखर सम्मेलन आयोजित करने के लिए यू.एस. द्वारा बुलावा अभी शुरू न होने वाला कदम रहा है। जमीनी स्तर पर तालिबान लगातार आगे बढ़ रहा है। 1 मई तक तालिबान चार अलग-अलग क्षेत्रों में आठ जिलों पर कब्जा कर चुका था। काबुल, लश्कर गाह (हेलमंद) और कंधार सहित कम से कम छह अस्थायी राजधानियों के द्वार पर विद्रोही मौजूद हैं। अभी तक, अफगानिस्तान के 398 जिलों में से 22% पर तालिबानी नियंत्रण है और 24% सरकार के पास हैं, जबकि देश के आधे से अधिक क्षेत्रों में प्रतिस्पर्धा जारी है।

एक निओकॉन युद्ध

अमेरिकी इतिहास का यह सबसे लंबा युद्ध अब इसके सबसे विनाशकारी में से भी एक बन रहा है। 20 साल के युद्ध के बाद, जब दुनिया की सबसे ताकतवर सेना अफगानिस्तान से बाहर निकल रही है, तालिबान, जिसे वह नष्ट करना चाहता था, सत्ता से बाहर किए जाने के बाद से अपने प्रभाव के चरम पर है। जिस आतंकवादी नेटवर्क को अमेरिका ने अफगानिस्तान में आतंक के खिलाफ अपना वैश्विक युद्ध शुरू करते समय नष्ट करने की कसम खाई थी, वह अब पूर्वी अफगानिस्तान से लेकर पूरे साहेल क्षेत्र तक यथा; पूरे एशिया और अफ्रीका में फैल गया है। अमेरिका के लिए क्या गलत हुआ? विशेषकर अमेरिका ने तीन मूलभूत गलतियाँ कीं, जिसके कारण महाशक्ति का इस क्षेत्र जो ‘साम्राज्यों के कब्रिस्तान’ के रूप में कहलाता है, से अपमानजनक निकासी हो रही है। सबसे पहली गलती, अमेरिका इस देश के इतिहास से कुछ भी सीखे बिना ही या एकध्रुवीय अभिमान से अंधा होकर इसमें उतर गया था। 19वीं और 20वीं शताब्दी में भी महान शक्तियों द्वारा अफगानिस्तान पर आक्रमण किया गया था। ब्रिटिश साम्राज्य, जिसे अफगानिस्तान के माध्यम से भारत पर रूसी आक्रमण की आशंका थी, ने 1839 में इस देश में सेना भेजी थी,और उसके शासक दोस्त मुहम्मद को बाहर करके और अपने सहयोगी शाहशूजा के शासन को स्थापित किया था। लेकिन ज्यादातर पश्तून योद्धाओं द्वारा अफगान प्रतिरोध के कारण अंग्रेजों को पीछे हटना पड़ा और 1842 में पीछे हटने के दौरान, एक डॉक्टर को छोड़कर, सभी ब्रिटिश और भारतीय सैनिकों को अफगानों द्वारा मार डाला गया था। 1979 में, सोवियत संघ ने इस देश के नवनियुक्त कम्युनिस्ट शासन को बचाने के लिए अफगानिस्तान में सेना भेजी थी और तख्तापलट करके एक दोस्ताना शासन स्थापित किया था। हालाँकि, बाद में सोवियत संघ को एक खूनी मुजाहिद्दीन प्रतिरोध का सामना करना पड़ा (जिसे यू.एस., सऊदी अरब और पाकिस्तान द्वारा नियंत्रित और प्रशिक्षित किया गया था), और 1989 में अपमान सहित पीछे हटना पड़ा था। अमेरिका ने सोचा होगा कि अक्टूबर 2001 में जब उन्होंने अफगान आक्रमण शुरू किया तो इतिहास उनके प्रति दयालु रहेगा। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। एक बार जब उन्होंने अफगानिस्तान पर आक्रमण किया, तो वे ब्रिटिश और सोवियत संघ द्वारा की गई गलतियों को देखते हुए, अपने दुश्मन अल-कायदा जो 11 सितंबर के हमलों के पीछे था, को लक्षित करते हुए एक रणनीतिक रूप से केंद्रित अभियान चला सकता था। उसे आतंकवादियों को लक्षित करना चाहिए था, उनके नेटवर्क को नष्ट कर देना चाहिए था और फिर वापस हो लेना चाहिए था। एक यथार्थवादी शक्ति यही करेगी। लेकिन बुश प्रशासन के नवरूढ़िवादी वैश्वीकरण से प्रेरित अमेरिका ने अपने लिए अधिक महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किए थे। वह तालिबान को गिराना चाहता था और अफगानिस्तान में एक केंद्रीकृत “लोकतांत्रिक” राज्य का पुनर्निर्माण करना चाहता था। अफगानिस्तान में ऊपर से नीचे तक लोकतांत्रिक संस्थाओं का निर्माण कैसे अमेरिका की विदेश नीति के हितों की सेवा करता है? वाशिंगटन में नवसाम्राज्यवादियों ने इसे आकर्षक पाया होगा, लेकिन इस कदम ने बहुत निम्न रणनीतिक अर्थ दिया। और अब, अमेरिका पीछे हट रहा है, व्यावहारिक रूप से अफगानिस्तान को तालिबान की दया पर छोड़ रहा है, उनके आश्वासन के बदले में कि वे अल-कायदा और इस्लामिक स्टेट जैसे आतंकवादियों की सहायता नहीं करेंगे।

रणनीतिक विफलता

तालिबान शासन को गिराने और अल-कायदा को गुफाओं और पहाड़ों में वापस खदेड़ने के बाद, अमेरिका के पास अभी भी अपने विभिन्न गुटों की मदद से अफगानिस्तान को स्थिर करने और फिर छोड़ने का मौका था। दिसंबर 2001 में तालिबान के प्रवक्ता मुल्ला अब्दुल सलाम जैफ ने आत्मसमर्पण करने की पेशकश की थी। तालिबान ने मामूली शर्तों की मांग की थी जिसमें उनके नेता मुल्ला उमर को घर लौटने की अनुमति शामिल थी। लेकिन अमेरिकियों ने इस प्रस्ताव को खारिज कर दिया था और देश के हर कोने से तालिबान को नष्ट करने का वादा किया था। तालिबान एक स्वदेशी उग्रवाद है जिसकी जड़ें अफगानिस्तान के पश्तून बहुसंख्यकों में गहरी हैं। उन्हें सत्ता से हटाना आसान था, लेकिन उनके देश में उन्हें हराना आसान नहीं था। और उन्हें हराने की कसम खाने के बाद, अमेरिका ने सद्दाम हुसैन को गिराने और वहां लोकतंत्र का निर्यात करने के लिए इराक पर आक्रमण शुरू किया। यह दूसरी गलती थी। अमेरिका ने आतंकवाद के खिलाफ अपने युद्ध के लिए पाकिस्तान के सामरिक समर्थन को हल्के में लिया, इस तथ्य को नजरअंदाज करते हुए कि पाकिस्तान के तालिबान के साथ गहरे रणनीतिक संबंध थे। पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में अमेरिकी अभियान का समर्थन करते हुए एक ही समय में तालिबान को शरण और समर्थन देकर दोहरा खेल खेला। पाकिस्तान के लिए, अफगानिस्तान में भारत के प्रभाव को रोकने के लिए तालिबान उनका वाइल्ड कार्ड रहा है। जब अमेरिका ने समय से पहले अफगानिस्तान में जीत की घोषणा की और 2003 में इराक पर आक्रमण करना शुरू कर दिया, तो पाकिस्तान के लिए तालिबान को फिर से संगठित करने में मदद करना आसान हो गया, ऐसे समय में जब अफगान सरकार भ्रष्टाचार और जातीय आधार पर घुसपैठ से जूझ रही थी। प्रांतीय राजधानियों के बाहर रहने वाले आम अफगानों के लिए, नई सरकार के तहत जीवन में ज्यादा बदलाव नहीं आया। जब अमेरिका इराक युद्ध के दलदल में फंसा हुआ था, तब तालिबान अफगानिस्तान के भीतरी इलाकों में लगातार वापसी कर रहा था। इराक और सीरिया में इस्लामिक स्टेट को हराने के बाद और इन “अंतहीन युद्धों” को समाप्त करने के लिए अपने देश में बढ़ती मांगों के बीच, जब तक अमेरिका ने अपना ध्यान वापस अफगानिस्तान में स्थानांतरित किया, तब तक पहले ही वह अफगान युद्ध हार चुका था।

तालिबान के आगे समर्पण

अमेरिका के लिए अफगानिस्तान छोड़ना एक यथार्थवादी मामला है। ऐसा लगता है कि अमेरिका बहुत पहले ही इस निष्कर्ष पर पहुंच गया था कि यह ऐसा युद्ध था जिसे पलटा नहीं जा सकता था। यह युद्ध उनके देश में भी बहुत तेजी से अलोकप्रिय होता जा रहा था,और राष्ट्रपतियों जिनमें बराक ओबामा से लेकर डोनाल्ड ट्रम्प और जो बिडेन तक शामिल हैं, इसे समाप्त करने का वादा कर रहे थे। अमेरिका भी अपना ध्यान पूर्वी एशिया पर केंद्रित कर रहा है जहां चीन बढ़ रहा है। विदेश नीति की चुनौतियों को देखते हुए अमेरिका अब कहीं और ध्यान लगा रहा है, और उसके लिए अफगानिस्तान में निरंतर सैनिकों और प्रतिबद्धताओं का कोई मतलब अब नहीं रह गया है। लेकिन अमेरिका अधिक व्यवस्थित निकासी का विकल्प चुन सकता था। इसके बजाय, उसने अपने सैनिकों को वापस खींचने के लिए तालिबान की शर्तों के सामने आत्मसमर्पण कर दिया। यह तीसरी गलती थी। तालिबान अभी तक अफगान सैनिकों को नहीं हरा पाया है। अफगान सरकार के पास लगभग 2,00,000 युद्ध-रत सैनिक हैं, जिनमें यू.एस.-प्रशिक्षित कुलीन विशेष बल भी शामिल हैं। सरकार अभी भी देश के अधिकांश जनसंख्या केंद्रों पर नियंत्रण करती है। अमेरिका से वायु शक्ति की मदद से तालिबान द्वारा प्रांतीय राजधानियों पर कब्जा करने के प्रयासों को हाल के दिनों में सफलतापूर्वक विफल कर दिया गया था। अमेरिका के अफगानिस्तान में मौजूद होने के साथ, संघर्ष गतिरोध में रहा है क्योंकि जहां सरकार विद्रोहियों को हराने में सक्षम नहीं है, वहीं तालिबान शहरों पर कब्जा करने में असमर्थ है। तालिबान से रियायतें निकालने के लिए अमेरिका को पाकिस्तान पर दबाव बढ़ाने के साथ इस गतिरोध का इस्तेमाल करना चाहिए था। इसके बजाय, ट्रम्प प्रशासन तालिबान के साथ उनकी शर्तों पर बातचीत के लिए चला गया। साथ ही अफगान सरकार को पूरी प्रक्रिया से बाहर रखा गया क्योंकि तालिबान उन्हें वैध होने के रूप में मान्यता नहीं देता। और अफ़ग़ानिस्तान की किसी भी चिंता का समाधान किए बिना, यू.एस. ने तालिबान के साथ सीधा समझौता किया। अब यह अमेरिकी निकास तालिबान के पक्ष में शक्ति संतुलन को निर्णायक रूप से स्थानांतरित कर देगा। यह बात विद्रोहियों को हमेशा से पता है। उन्होंने फरवरी 2020 में अमेरिका के साथ समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद से ही अफगान सरकार को कमजोर करने और समाज को आतंकित करने के उद्देश्य से हमले तेज कर दिए हैं और लक्षित हत्याएं की हैं। और जब से शेष अमेरिकी सैनिकों ने 1 मई को अफगानिस्तान से पीछे हटना शुरू किया है, तालिबान ने अधिकाधिक क्षेत्रों पर कब्जा करना शुरू कर दिया है। अमेरिकियों के लिए युद्ध समाप्त हो सकता है, लेकिन अफगानों के लिए यह किसी न किसी रूप में जारी रहेगा।

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