विज्ञान और छद्म विज्ञान का एक दृश्य

विकास के लक्ष्य के बावजूद भारत तेजी से अज्ञानता की स्थिति ओर बढ़ रहा है

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पूरी तरह से आधुनिक लगते हैं। लेकिन वे निराशाजनक रूप से अंधविश्वास में भी डूबे हुए नजर आते हैं। वे चंद्रमा की खोज को बढ़ावा देते हैं, सबसे परिष्कृत लड़ाकू विमानों के खरीद का आदेश देते हैं, पहली बुलेट ट्रेन परियोजना शुरू करते हैं, भारत को एक वैक्सीन ‘पावरहाउस’ होने का दावा करते हैं जो दुनिया को टीकों की आपूर्ति करता है आदि ये सब आधुनिक विज्ञान के उत्पाद हैं। लेकिन वे एक साथ छद्म विज्ञान को भी बढ़ावा देते हैं। वे प्राचीन अंक ज्योतिष के आधार पर शुभ समय पर नाद और शंख बजाने के लिए जनता को प्रोत्साहित करके SARS-CoV -2 को समाप्त करने के लिए ब्रह्मांडीय ऊर्जा का आह्वान करते हैं; वे योग गुरु की मनगढ़ंत COVID-19 दवा लॉन्च करने पर अपने कैबिनेट सहयोगियों की खिंचाई नहीं करते हैं, जबकि वह ऐसी दवा है जिसका परीक्षण का कोई नैदानिक ​​सबूत नहीं है और जिनकी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन द्वारा निंदा की गई है। श्री मोदी अपने पौराणिक अतीत में भारत की वैज्ञानिक उपलब्धियों की चमत्कारिक और प्रशंसापूर्ण बात करते हैं, उदाहरण के लिए, पश्चिम के आविष्कार करने से बहुत पहले हाथी के सिर को भगवान गणेश पर स्थानांतरित करना प्लास्टिक सर्जरी में बड़े कदमों के रूप में गिनाना।

नोबेल-विजेता भौतिक विज्ञानी रिचर्ड फेनमैन ने सभी प्रकार के छद्म विज्ञान यथा; प्राचीन अंधविश्वास, काला जादू, जादू, डायन, ज्योतिष, मन पढ़ने, अलौकिक धारणा या अनुभूति, विस्तारित चेतना, गैंडे के सींगों से बने चौपासे, और अन्य विवादास्पद विचारों,आदि का वर्णन करने के लिए ‘कार्गो कल्ट साइंस’ शब्द गढ़ा, जो युगों से विज्ञान के लिए पारित हो गया है। उन्होंने प्रशांत महासागर में दक्षिण सागर द्वीपवासीयों, जिन्होंने विश्व युद्ध के दौरान विमानों को उतरते और कार्गो पहुंचाते देखा था,के लोगों के लिए ‘कार्गो कल्ट’ की बात की। युद्ध के बाद, वे आसमान से इसी तरह के उपहार प्राप्त करना चाहते थे। इसलिए उन्होंने रनवे से मिलते-जुलते लैंडिंग स्ट्रिप्स तैयार किए, दोनों तरफ फ्लेयर्स सेट किए, लकड़ी के टुकड़े बनाए जो हेडफ़ोन की तरह दिखते थे, एंटेना से मिलते-जुलते बांस के डंडे लगाये, और फिर वस्तुओं के अर्थात कार्गो के पहुंचने के लिए विमानों के उतरने का इंतजार किया। वे इंतजार और इंतजार करते रहे और खम्भों व डंडों और फ्लेयर्स को समायोजित करके अपने अभ्यास को दोहराते रहे लेकिन विमान नहीं उतरे। वे कुछ भूल रहे थे। उन्होंने सब कुछ ठीक किया था, लेकिन वहां विमान नहीं थे। वे रूप बदल रहे थे लेकिन पदार्थ नहीं। “हमें वास्तव में उन सिद्धांतों को देखना चाहिए जो काम नहीं करते हैं, और उन विज्ञानों को भी जो विज्ञान नहीं हैं,” फेनमैन ने कहा। “कार्गो कल्ट साइंस” अनुसंधान के लिए उनका वाक्यांश था जो विज्ञान की नकल करता था। कभी भी सत्यापन योग्य परिणाम न देने के बावजूद, इसने सार्वजनिक स्वीकृति प्राप्त कर ली क्योंकि यह कठोर कार्यप्रणाली की समानता को धारण करती थी।

प्रस्तावों की गहनता

भारत में मायावियों की भरमार है,यथा; विभिन्न रंगों के देवता और ‘साधु’, स्थानीय खाद्य पदार्थों के आहार विशेषज्ञ, जो स्व-अभिषिक्त डॉक्टरों में बदल गए हैं, और नीम-हकीम जो औषधालय बन गए हैं और विभिन्न वैकल्पिक दवाओं का अभ्यास कर रहे हैं। पारंपरिक चिकित्सकों ने रक्त शर्करा और कोलेस्ट्रॉल के स्तर का विश्लेषण करने के लिए सीमित पैमाने पर प्रयोगशालाएं और पश्चिमी चिकित्सा की तर्ज पर एक्स-रे मशीन और ECGs जैसे उपकरण जो विज्ञान के लिबास को प्राप्त करने के लिए उन्हें विश्वसनीयता प्रदान करते हैं, को स्थापित किया है। वे गूढ़ आहार से लेकर गोबर और गोमूत्र तक, सभी बीमारियों के लिए ‘सबका-इलाज’ के रूप में सब कुछ करते हैं, जिसमें COVID-19 संक्रमण भी शामिल है, जिसने देश को तबाह कर दिया है। वे उभरते हुए मध्यम वर्ग के लिए वैदिक दवाओं से लेकर विभिन्न चीजों की पेशकश करते हैं, जो प्रतिरक्षा तंत्र का वादा करती हैं और कामेच्छा बढ़ाने के लिए लिबिडो को बढ़ाने से लेकर ‘तत्काल निर्वाण’ का दावा करती हैं।

इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता है कि घरेलू उपचार अक्सर फायदेमंद होते हैं। अगर किसी को सर्दी-जुकाम है तो पिसी हुई काली मिर्च और दूध में हल्दी उबालकर काढ़ा बनाने से बहुत फायदा होता है। लहसुन और अदरक से युक्त छाछ से भयानक फूले हए पेट को कम किया जा सकता है। पके केले के छिलके में ताजा चूना लगाकर और प्रभावित हिस्सों को लपेटकर पैरों में कॉर्न्स को बिना सर्जरी के ठीक किया जा सकता है। घरेलू नुस्खों से लेकर आयुर्वेद तक कई ऐसे इलाज हैं जो बीमारियों के लिए काम करते हैं। आदिवासी समुदायों द्वारा उपयोग की जाने वाली दवाओं के उपचार सहित दुनिया के अन्य हिस्सों की वैकल्पिक दवाएं उपयोगी रही हैं और पीढ़ियों से चली आ रही हैं। लेकिन उनकी सीमाओं को पहचानना और स्वीकार करना होगा। आधुनिक चिकित्सा, विज्ञान की एक शाखा जिसने मौजूदा मान्यताओं और प्रथाओं पर सवाल उठाया, ने यह पता लगाने के लिए प्रयोग की विधि की खोज की कि क्या दवाएं काम करती हैं, और यदि वे नहीं करती हैं, तो यह नए विचारों की खोज को प्रोत्साहित करती है। यह वैज्ञानिक युग की शुरुआत थी।

वैज्ञानिक प्रगति केवल इसलिए संभव हुई है क्योंकि विज्ञान के महापुरुषों ने अपनी अज्ञानता को स्वीकार किया और सवाल करने से नहीं डरे; प्रत्येक पीढ़ी ने ज्ञान की धारा में कुछ न कुछ जरुर जोड़ा क्योंकि उन्होंने अज्ञात भय व अन्धविश्वास का द्वार छोड़ दिया। हालांकि, छद्म वैज्ञानिक समाज के लिए एक खतरा हैं क्योंकि वे अपने विश्वास प्रणालियों के बारे में एकदम सुनिश्चित हैं। वे संदेह और अनिश्चितताओं से सहज नहीं हैं। सुनिश्चित न होना ठीक है क्योंकि निश्चितता सुधार के सभी दरवाजे बंद कर देती है और प्रगति को अवरुद्ध कर देती है, जो एक सभ्यता के लिए घातक हो सकता है।

विषय पर लौटते हुए, कोई यह सोचने पर मजबूर हो जाता है कि श्री मोदी विज्ञान के व्यक्ति हैं या छद्म विज्ञान के। वह अलग-अलग समय और अलग-अलग मौकों पर दोनों पर जोर क्यों दे रहे हैं? यदि यह दोनों आधुनिक और तर्कसंगत, पारंपरिक और अंधविश्वासी रूप जनता को खुश करने के लिए मतदाताओं को लुभाने वाली एक राजनीतिक रणनीति है, तो हाल के राज्य चुनावों को देखते हुए अपेक्षित परिणाम नहीं मिले हैं। उनका मिश्रित संदेश, रहस्यवादी प्रतीकवाद और पौराणिक रूपक दुनिया की आधुनिक विकसित अर्थव्यवस्थाओं के साथ-साथ भारत को तकनीकी रूप से उन्नत राष्ट्र के लिए प्रेरित करने के लिए एक नेता की छवि के साथ असंगत हैं। जबकि श्री मोदी के वफादार लोग जो भगवा खेमे के भीतर हैं या हाशिये पर हैं, कहर बरपा रहे हैं और भारत की छवि को ख़राब दिखा रहे हैं, जो अज्ञानता और अंधविश्वास में खो गया है और मध्य युग में वापस जा रहा है। उनके प्रशासक और वैज्ञानिक जो नीति-निर्माण के शीर्ष हैं. को प्रतिगामी रूढ़िवादी ताकतों की प्रबलता से पंगु बना दिया गया है और जो भारत को विकसित अर्थव्यवस्थाओं के समूह में ले जाने के लिए वैज्ञानिक प्रगति और ढांचागत प्रगति को गति देने में असमर्थ हैं। भारत, जो अब तक एक उभरती हुई शक्ति था, अचानक एक बड़ी आपदा के बीच छद्म विज्ञान के समुद्र में एक संस्थापक जहाज के रूप में जाता हुआ प्रतीत हो रहा है।

बुनियादी मूल्य

भारतीय सभ्यता, अपनी ज्ञात शुरुआत से, लोगों के लिए जीवन और अस्तित्व के गहरे अर्थ का पता लगाने के लिए ज्ञान की खोज के रूप में कार्य करती रही है। यह तीन हजार साल पहले की मानव आत्मा के इतिहास में विचारों का एक महान साहसिक कार्य है। भारतीय दार्शनिक और पूर्व राष्ट्रपति एस राधाकृष्णन ने कहा था कि, “मनुष्य के लिए अपने इतिहास से ज्यादा पवित्र कुछ भी नहीं है … हम भारतीयों के लिए, उपनिषदों का अध्ययन जरूरी है, अगर हमें अपने राष्ट्रीय अस्तित्व और चरित्र को संरक्षित करना है।” उन्होंने आगे कहा, “हमारे अतीत में बहुत कुछ ऐसा है जो अपमानजनक और अभावपूर्ण है लेकिन बहुत कुछ ऐसा भी है जो जीवन देने वाला और ऊंचाई प्रदान करने वाला है। यदि अतीत को भविष्य के लिए एक प्रेरणा के रूप में कार्य करना है, तो हमें इसका भेदभाव और सहानुभूति के साथ अध्ययन करना होगा … जबकि मौलिक उद्देश्य व हमारी संस्कृति की आवश्यक भावना का गठन करने वाले शासकीय विचार हमारे अस्तित्व का हिस्सा हैं, उन्हें हमारे समय की जरूरतों और परिस्थितियों के अनुसार बदलती अभिव्यक्तियों को प्राप्त करना चाहिए।”

श्री मोदी को उपरोक्त शब्दों पर ध्यान देना चाहिए। आधुनिक विज्ञान भारतीय चिंतन का विरोधी नहीं है। उपनिषद काल से हमारे अस्तित्व के मूल में नए ज्ञान प्राप्त करने के लिए वाद-विवाद, नए विचारों को अपनाने और विकास की भावना,आदि रही है। बिना समय गंवाए श्री मोदी को देश को विज्ञान के रास्ते पर वापस लाना चाहिए।

कैप्टन गोपीनाथ एक सैनिक, किसान और उद्यमी हैं।