संविधान का मूल ढांचा

  1. क्या यह संविधान में वर्णित है?

नहीं, संविधान में मूल ढांचा के रूप् में किया भाग वर्णन नहीं किया गया है।

  1. यह भारतीय संविधान का अभिन्न भाग कब और कैसे बन गया?

संसदीय संप्रभुता एवं न्यायिक सर्वोच्चता के बीच की रस्सा-कस्सी (खींच-तान) में संविधान की मूल ढांचा का जन्म केशवानंद भारती बनाम केरल सरकार वाद में वर्ष 1973 में हुआ।

  1. क्या न्यायपालिका ने संविधान की मूल ढांचा का उल्लेख स्पष्ट रूप में किया है?

नहीं, न्यायपालिका ने यह स्पष्ट नहीं किया कि संविधान का कौन-सा भाग संविधान का मूल ढांचा है और कौन-सा नहीं| इसकी व्याख्या न्यायपालिका स्वयं करेगी।

  1. न्यायपालिका द्वारा वगीकृत संविधान की मूल ढांचा की परिकल्पना से संसदीय संप्रभुता पर क्या प्रभाव पड़ा है।

भारतीय संसद भारतीय संविधान के उपबंधो के आधीन रहते हुए विधि निर्माण हेतु स्वतंत्र इकाई है परंतु यह भारतीय संविधान के भाग-3 में वर्णित मौलिक अधिकारों को नकारात्मक रूप से प्रभावित नहीं करना चाहिए।

भाग-3 में वर्णित अधिकार, संविधान के मूल ढांचे की परिकल्पना से पहले भारतीय संसद के विधायी शक्ति के अधिकार पर प्रभावी नियंत्रण था परंतु इसके निर्माण के साथ ही एक ओर प्रभावी नियंत्रण स्थापित हो गया।

न्यायपालिका द्वारा संविधान के मूल ढांचे के रूप में वर्णित कुछ उपवंध :-

  1. संविधान की सर्वोच्चता
  2. सरकार के विभिन्न अंगों के बीच शक्ति का बंटवारा
  3. संघीय शासन प्रणाली
  4. संसदीय शासन प्रणाली
  5. राष्ट्र की एकता एवं अखण्डता
  6. संविधान का धर्मनिरपेक्ष चरित्र
  7. न्याय तक समान पहुँच एवं एक कल्याणकारी राज्य की स्थापना हेतु शासन व कई अन्य जो न्यायपालिका इस हेतु तर्कसंगत समझे|

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