पाल युग की कलाएं:

पाल युग में पत्थर और कांसे की मूर्तियों के निर्माण की एक उन्नत शैली का विकास बिहार में हुआ था, जिसका प्रसार बंगाल में भी देखा जा सकता है। काँस्य-प्रतिमाओं के निर्माण की इस शैली में निर्णायक देन धीमन और उसके पुत्र बिठयाल की मानी जाती हैं ये दोनों नालन्दा के निवासी थे और नवीं शताब्दी ई. के दो महान पाल शासकों धर्मपाल और देवपाल के समकालीन थे।

पाल युग की कला की प्रधान तत्व निम्नलिखित हैं-

(1) मूर्तिकला

(2) मृदभाण्ड कला

(3) चित्रकला

(4) भित्ति चित्र (दीवारों पर अंकित किए जाने वाले चित्र)

(5) स्थापत्य कला

  1. मूर्तिकला

नलंदा में मंदिर संख्या-13 से प्राप्त अवशेष धातु को गलाने और उसे सांचों में ढालने के प्रमाण प्रस्तुत करते हैं। पालयुगीन काँस्य प्रतिमाएं सांचे में ही ढली हुई है। इनके नमूने नालंदा तथा प्रतिहार (गया के समीप) आदि स्थानों में मिले हैं। नालदा से प्राप्त नमूने मुख्यतः राजा देवपाल के हैं जबकि क्रूकिहार से प्राप्त हुई मूर्तिया परवर्ती काल की हैं। दोनों की शैली वस्तुतः एक समान है। इसके अतिरिक्त फतेहपुर, अंतिचक, इमादपुर आदि स्थानों से भी ऐसी मूर्तियां कांसू के बने हुए स्तूपों के नमूने और कुछ बर्तन भी पाए गए हैं। प्रधानता मूर्तियों की है, जिनमें अधिकांश बौद्ध धर्म से प्रभावित है, इन मूर्तियों में मुख्यतः-

(i)  बुद्ध (ii) बोधिसत्व (iii) अवलोकितेश्वर (iv) मंजुश्री (v) मैत्रेय (vi) तारा (vii) जमला (viii) जमला (ix) हत्थय्रीव इत्यादि।

हिंदुओं के देवी-देवताओं में मुख्य- (i) विष्णु (ii) बलराम (iii) सूर्य (iv) उमा महेश्वर एवं (v) गणेश आदि।

 

पत्थर की मूर्तियों की विशेषताएं:

(i) मूर्तियों वाले बेसाल्ट पत्थर की बनी हुई हैं, जो संथालपरगना और मुंगेर जिला की पहाड़ियों से प्राप्त किए गए हैं।

(ii) सामान्यतः इन मूर्तियों में केवल शरीर के अगले भाग को दिखाने की कोशिश की गई है। कुछ ही मूर्तियों में पिछले भाग को भी उतने ही कौशल से ध्यानपूर्वक बनाया गया है।

(iii) इन मूर्तियों में भी मुख्यतः देवी-देवताओं का ही चित्रण किया गया है। इसमें प्रधानता, तथागत बुद्ध की मूर्तियों की है, जिनमें उनके जीवन की सभी महत्वपूर्ण घटनाओं को दिखाया गया है, जैसे उनका जनन्म, प्रथम धर्मोपदेश, निर्वाण आदि। इसके बाद विष्णु देव की मूर्तिया है। शैवस्त तथा जैन धर्म का प्रभाव बहुत सीमित रहा है और इनसे संबद्ध मूर्तिया यदा-कदा ही देखी जाती है।

(iv) सभी मूर्तियां अत्यंत सुंदर है और कलाकार की शिल्पगत परिपक्वता को दर्शाती है। इन मूर्तियों में अलंकरण की प्रधानता इनके रूप को और भी आकर्षक बनाती है।

  1. मृदभांड-कला

इस कला में मृदभांड के सुंदर एवं कलात्मक रूप देखे जा सकते हैं। इनके कुल उल्लेखनीय उदाहरण विक्रमशीला महाविहार के अवशेषों से प्राप्त हुए है। ऐसी मूर्तियों दीवारों पर सजावट के लिए बनायी जाती थी। इनमें धार्मिक तथा सामान्य जीवन के दृश्य देखे जा सकते हैं। लोगों के रहन-सहन, खान-पान, वेश-भूषा, क्रिया-कलाप, क्रीड़ा एवं मनोरंजन, सुख-दुख, रीति-रिवाज और संस्कार आदि की झलक इनमें स्पष्ट देखी जा सकती है। ऐसी प्रस्तुतियों में धार्मिक प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचार होता है। बुद्ध बोधित्व, तारा आदि की प्रस्तुति बौद्ध धर्म के और हुमान की प्रस्तुति हिंदु धर्म के प्रतीक को स्पष्ट दर्शाती है। कलात्मक सुंदरता का एक उत्कृष्ट उदाहरण एक तख्ती है, जिसपर एक स्त्री को बैठी हुई मुद्रा में दिखाया गया है। उसका दहिना और बांयू पैर पर रखा हुआ और शरीर झुका हुआ है। एक हाथ में आइना लिए वह अपने रूप को निहार रही है और दूसरे हाथ की ऊँगलियों से मांग में सिंदुर भर रही है। चेहरे की सुदंरता और भोलापान, उभरे हुए उरोज एवं उसकी पतली कमर के माध्यम से इसके शारीरिक सौंदर्य पर ध्यान केंद्रित करने का सफल प्रयास किया गया है। उसके शरीर के आभूषणों से ढंककर उसकी सुंदरता को और आकर्षक बना दिया गया है।

  1. चित्रकला

इस काल की चित्रकला के दो रूप उपलब्ध हैं:

(i) पांडुलिपियों में उपलब्ध एवं

(ii) दीवारों पर अंकित चित्र

पाल-युग में चित्रकला की अच्छी प्रगति हुई थी। पांडुलिपियों में विषय-वस्तु के अनुकूल एवं सजावटी चित्रण के अतिरिक्त दीवारों पर चित्र बनाने के उदाहरण भी इस काल में देखे जा सकते हैं। चित्रित पांडुलिपियों तालपत्र पर……………। इनके श्रेष्ठ उदाहरण हैं-

अष्टसहस्त्रिक, पज्ञापारमित और पंचरक्ष। ये दोनों कैंम्ब्रिज विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में (संरिक्षत) सुरक्षित हैं। इनमें लगभग 100 लघु चित्र बने हुए हैं। इनमें महात्मा बुद्ध के जीवन के विभिन्न दृश्यों के अतिरिक्त महायान परंपरा में पूजे जाने वाले विभिनन बौद्ध देवी-देवताओं का भी चित्रण किया गया है।

इनमें प्राथमिक (प्रधान) रंगों में लाल, नीला काला एवं सफेद रंगों का तथ सहायक रंगों में हरा, बैंगनी, हल्का गुलाबी और घूसर रंगों का प्रयोग किया गया है। इन चित्रों पर तांत्रिक कला का भी प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। कहीं-कहीं इनकी विशेषताएं नेपाल और बर्मा की चित्रकला से समानताएं भी प्रस्तुत करती है। इन चित्रों को बनाने वाले कलाकारों की दक्षता साफ झलकती है और इन्हें संसार में चित्रित पांडुलिपियों के सुंदरतम उदाहरण में एक कहा जा सकता है।

  1. भित्तिचित्र

चित्रकला का एक अन्य रूप भित्तिचित्र भी है एवं इसके प्रमाणा नालंदा जिले के सरायस्थल से प्राप्त हुआ है। ग्रैनाइट पत्थर के बने हुए एक बड़े चबूतरे के नीचे के भाग पर कुछ जामितीय आकार के फूलों की आकृतियों और मनुष्य एवं पशुओं का चित्रण किया गया है। अब  यह चित्र काफी धंुधले पड़े चुके है फिर भी कुछ आकृतियों की पहचान संभव है। इनमें हाथी, घोड़ा, नर्तकी, बोधिसत्व और जम्मला प्रमुख है। इन चित्रों की शैली पर अजंता और बाघ के गुफा चित्रों की शैली का स्पष्ट प्रभाव देखा जा सकता है। वैसे भी दोनों की प्रसंगों में चित्रों को बनाने और रंगने का ढंगल लगभग एक  जैसा है।

  1. स्थापत्य कला

पाल शासकों की देन, स्थापत्य कला के क्षेत्र में भी निर्णायक रही है। इसके साक्ष्य ओदंतपुरी, नालंदा और विक्रमशीला महाविहार से प्राप्त होते हैं। औदंतपुरी के अवशेष सुरक्षित नहीं है। नालंदा में विभिन्न युगों में बने मंदिर, स्तूप और विहार देखे जा सकते हैं। भिक्षुओं के रहने के आवास एक निश्चित योजना के आधार पर बने हैं, जिनमें खुले आंगन के चारों और बरामदे हैं। इनके पीछे कमरे हैं, जहां भिक्षु निवास किया करते थे। इमारतें दो मंजिली थी और इनमें सीढ़ियों की व्यवस्था थी। विक्रमशीला यह विहार के अवशेष पालयुगीन स्थापत्य कला की विशिष्टता को और भी स्पष्ट करते हैं। यहां एक मंदिर और स्तूप के अवशेष मिले हैं। दोनों ही ईंटों के बने हुए हैं। इननमें पत्थर और मिट्टी की बनी गौतम बुद्ध की विशाल मूर्तिया हैं। दीवारों के बाहरी हिस्से पर मिट्टी की तख्तियों से सजावट का काम किया गया है। इन पर बौद्धधर्म एवं वैष्णव मत, दोनों का प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगोचर होता है। सामान्य जीवन के दृश्य भी इनमें देखे जा सकते हैं। इस प्रकार हम पाते हैं कि पाल युग में मूर्तिकला, स्थापत्य कला एवं चित्रकला वाकई उन्नत अवस्था में थी।

 

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