झारखंड के स्वतंत्रता सेनानी

झारखंड के जिन वीर सपूतों ने अंग्रेजों के विरुद्ध अंतिम साँस तक विद्रोह की ज्वाला सुलगाए रखी, उनकी संख्या बहुत है। अपने प्राण देकर रक्त से क्रांति की मशाल सुलगानेवाले इन आदिवासी शहीदों का वर्णन संभवतः किसी महाकाव्य में संकलित हो सके, लेकिन हम उन सबका सम्मान करते हुए कुछ महान् आत्माओं का वर्णन कर रहे हैं, जिन्होंने देश के लिए अपने प्राण बलिदान कर दिए।

तिलका माँझी

इस अमर शहीद की दूरदृष्टि ने अंग्रेजों की इच्छा को उसी समय भाँप लिया था, जब अंग्रेजों ने सन् 1767 में झारखंड में अपने पाँव रखे थे। तब 17 वर्ष के इस किशोर ने तुरंत भाँप लिया था कि पहले से राजाओं, नवाबों और जमींदारों के शोषण एवं अत्याचारों से पीडित झारखंड एक नई मुसीबत के हाथों में जा रहा है।

संथाल जाति के तिलका माँझी एक योग्य वक्ता और कुशल तीरंदाज थे। उनका जन्म स्वतंत्र वातावरण में हुआ था। इसीलिए उन्हें स्वतंत्रता अत्यंत प्रिय थी। जब अंग्रेजों के कदम झारखंड की भूमि पर पडे. तभी से उन्होंने देश में चल रही अंग्रेजों की अनीतिकारी शोषण व्यवस्था और फूट  डालो, राज करो’ की सूचना लोगो तक पहुंचा कर उन्हें संगठित करना शुरू किया। जब एक दल तैयार हो गया तो तिलका माँझी ने इन विदेशी शासकों के खिलाफ वनचरीजोर से विद्रोह की शुरुआत कर दी।

अंग्रेज अधिकारी ऑगस्ट्स क्लीवलैंड जब राजमहल क्षेत्र का अधीक्षक बनकर तो उसने फूट डालने का काम शुरू कर दिया। उसने 9 महीनों के अंदर 40 पहाडी गांवों के सरदारों को अपने झांसे में लेकर उन्हें सभी प्रकार के करों से मुक्त कर दिया। तिलक मांझी ने इस पक्षपात को अपने हक में प्रयोग करके लोगों में विश्वास जगाया

क्योंकि अन्य जनजातियों को तो कर देना ही पड़ता था। अब केवल संथाल ही नहीं. बल्कि अन्य जनजाति के लोग भी तिलका माँझी के साथ आ खड़े हुए। इस संगठन ने कर की ऐसी दोहरी नीति का विरोध करने हेतु  बल का प्रयोग भी किया।

इस संगठन की सक्रियता और तिलका माँझी की लोकप्रियता ने अंग्रेज अधिकारियों को चिंतित कर दिया। क्लीवलैंड ने एक सचल दल की सहायता से तिलका माँझी को पकड़ने का अभियान चलाया। एक दिन मौका देखकर तिलका माँझी ने क्लीवलैंड को अपने तीर का लक्ष्य बनाकर मार डाला। अंग्रेजों के लिए यह बड़ा आघात था। बड़े पैमाने पर तिलका माँझी और उनके साथियों के खिलाफ सैन्य काररवाई की गई, लेकिन वे उनके हाथ नहीं आए। उनके छापामार हमलों से अंग्रेजों को बहुत हानि उठानी पड़ रही थी। अंततः तिलका माँझी को पकड़ लिया गया और सन 1785 में उन्हें भागलपुर में पेड़ से लटकाकर फाँसी दे दी गई। तिलका माँझी ने झारखंड के पहले ऐसे शहीद का गौरव पाया, जिसने अंग्रेज सरकार का विरोध करने पर फाँसी पाई।

बुद्धू भगत

ये कोल विद्रोह के प्रमुख नेताओं में से एक थे। बुद्धू भगत का जन्म राँची जिला के चान्हों प्रखंड के अंतर्गत कोयल नदी के तट पर स्थित सिंलगाई गाँव में 1792 को उराँव परिवार में हुआ था। बुद्धू भगत ही झारखंड के प्रथम क्रांतिकारी थे, जिन्हें जिंदा या मुरदा पकड़ने के लिए ब्रिटिश सरकार ने 1000 रुपए इनाम की घोषणा की थी। सन् 1831 में अपनी जमीन छिन जाने, न्याय न मिलने और जमींदारों के घोर उत्पीड़न से उपजे असंतोष ने ‘कोल विद्रोह’ को जन्म दिया। बुद्धू भगत ने अपने साथियों और 700 कोल लोगों के साथ सिंहभूम, राँची, हजारीबाग, टोरी तथा मानभूम में अत्याचारियों के विरुद्ध ऐसा भीषण प्रदर्शन किया कि लगभग 1,000 लोग मारे गए। इस महान् आंदोलन का एक नायक अंग्रेजी सेना से घिर गया तो इसने बेटे, भतीजे और अन्य 150 साथियों के साथ 14 फरवरी, 1832 को वीरगति प्राप्त की।

पांडेय गणपत राय

सन 1809 में भौरों गाँव में जनमे इस वीर सिपाही ने बचपन से ही अच्छे संस्कार पाए। ये छोटानागपर के दीवान सदाशिव राय के भतीजे थे, जो उन्हीं के साथ पालकोट में रहकर बहुभाषी उच्च शिक्षा प्राप्त कर रहे थे। सदाशिव राय की मृत्यु के बाद छोटानागपुर के राजा ने योग्य कर्मठ और प्रतिभाशाली गणपत राय को अपना दीवान बना लिया। थोड़े ही समय में गणपत राय ने अपनी कार्यकुशलता से राजा को प्रभावित कर दिया। छोटानागपुर के उत्तराधिकारी जगन्नाथ सहदेव को अंग्रेजों ने अपदस्थ करके एक अंग्रेज अधिकारी एडम ह्यूम को वहाँ का प्रबंधक बना दिया था। इस अन्याय ने गणपत राय को अंग्रेजों का घोर शत्रु बना दिया। यही कारण था कि उन्होंने जल्दी ही अंग्रेजों के विरुद्ध विद्रोह कर दिया।

देशभर में सन् 1857 का विद्रोह शुरू हो गया था और डोरंडा छावनी में भी अंग्रेजों के खिलाफ विद्रोह शुरू हो गया। इस विद्रोही सैनिक दल का नेतृत्व गणपत राय और राजा विश्वनाथ सहदेव ने किया। उन्होंने राँची में हाहाकार मचा दिया। कचहरी में आग लगा दी गई, कोषागार लूट लिया गया और जेल से 300 कैदियों को मुक्त कराकर उन्हें विद्रोहियों ने अपने साथ मिला लिया।

अंग्रेजों ने एक देशद्रोही जमींदार महेश साही की सहायता से गणपत राय को पकड़ लिया और 21 अप्रैल, 1858 को उन्हें राँची के जिला स्कूल के गेट पर उसी कदंब वृक्ष पर, जिस पर ठाकुर विश्वनाथ शाहदेव को फाँसी दी गई थी. फाँसी दे दी गई।

सिद्धू और कान्हू

संथाल विद्रोह के ये नायक सहोदर भाई थे, जिन्होंने अपने दो भाइयों चाँद और भौरों के साथ मिलकर अंग्रेजी शासन की नींव हिला दी थी। सन् 1815 से 1835 बीच जनमे इन चारों भाइयों ने जिस कुशलता, निर्भीकता और स्वातंत्र्य भावना से ‘संथाल विद्रोह’ की कमान सँभाली तथा अपने प्राण न्योछावर कर दिए, यह अपने आप में एक अद्वितीय उदाहरण है। सबसे बड़े भाई सिद्धू में अद्भुत नेतृत्व की क्षमता एवं वाक् कुशलता थी। अधिकारों की लड़ाई को धर्म से जोड़कर उसने संथालो सहित लगभग सभी जनजातियों को संगठित कर दिया था। उसने अपने भाइयों के साथ मिलकर परंपरागत ढंग से समय की माँग के अनुसार लोगों में स्वंत्रता की भावना को जाग्रत् किया। 30 जून, 1855 भगनाडीह में उन्होंने विशाल जनसमूह एकत्र करके में धार्मिक आख्यानों, धर्मयुद्ध और सत्य की विजय आदि जोशीले संदेशों से एकता और अधिकार प्राप्ति के साथ स्वराज का नारा दिया। संगठन ने सिद्धू को राजा, कान्हू को मंत्री, चाँद को प्रशासक और भैरों को सेनापति के रूप में स्वीकार कर लिया। इसके बाद सशस्त्र आंदोलन शुरू हो गया। अंग्रेज सरकार ने इस विद्रोह को दबाने के लिए सेना भेजी। 10 जुलाई, 1855 को सिद्धू-कान्हू ने इस सेना को हरा दिया और राजमहल के किले पर कब्जा कर लिया। अंग्रेजों ने 10 नवंबर, 1855 को मार्शल लॉ लगा दिया। ‘संथाल विद्रोह’ अंग्रेजों पर भारी पड़ रहा था। अंग्रेजों ने अपनी सेना में इजाफा कर लिया और उन चारों भाइयों पर भारी इनाम घोषित कर दिया, लेकिन फिर भी कोई बात नहीं बनी। जब बरहैत में संथालों और अंग्रेजों का सामना हुआ तो इसमें चाँद और भैरों वीरगति को प्राप्त हुए। फरवरी 1856 में कान्हू को उपरबंदा में पकड़ लिया गया तथा सिद्ध भी वहीं पकडा गया। 26 जुलाई, 1856 को दोनों भाइयों को फाँसी दे दी गई। इस प्रकार सहोदर क्रांतिकारियों ने देशहित के लिए अपने प्राणों का बलिदान देकर एक अनूठा और अविस्मरणीय उदाहरण पेश किया।

विश्वनाथ शाहदेव

अंग्रेजों ने विश्वनाथ शाहदेव से ही छोटानागपूर का उत्तराधिकार हड़पा था। ठाकूर एनी साह ने, जिसने राँची के प्रसिद्ध जगरनाथ मंदिर की स्थापना की थी की सातवीं पीढ़ी में ठाकुर  विश्वनाथ शाहदेव का जन्म 12 अगस्त, 1817 को बडकागढ़ की राजधानी सतरंजी में हुआ था। इनके पिता का नाम रघुनाथ शाहदेव एवं माता का नाम बानेश्वरी था। उन्होंने गणपत राय के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ ‘डोरंडा सैनिक विद्रोह’ का नेतृत्व किया और कई सफलताएँ अर्जित कीं। एक विश्वासघाती की सहायता से उन्हें पकड़ लिया गया और 16 अप्रैल, 1858 को राँची के जिला स्कूल के उसी गेट पर फाँसी दे दी गई, जिस पर बाद में गणपत राय को फाँसी दी गई थी।

शेख भिखारी

राँची के खुदिया गाँव के जमींदार शेख पहलवान के घर पर सन् 1816 में जनसे इस स्वतंत्रता प्रेमी ने भी अंग्रेजों को नाकों चने चबवा दिए थे। लगभग कलाओं में प्रवीण शेख भिखारी एक कुशल नेतृत्वकर्ता भी थे। खटंगा के रजा उमराव सिंह के दीवान शेख भिखारी 31 जुलाई, 1857 को स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े थे। राजा उमराव सिंह भी इनके साथ ही रहे। संथाल विद्रोहियों सहित कितने  स्वतंत्रता के दीवाने इनके साथ आ मिले थे। हजारीबाग में व्यापक पैमाने पर विद्रोह हुआ जिसे अंग्रेजी सेना ने बड़ी निर्ममता से दबा दिया। इस विद्रोह में अंग्रेजों ने लगभग 200 विद्रोहियों को फांसी पर लटका दिया था। 6 जनवरी, 1858 को इन दोनों वीरों को चुटुपाली घाटी के पास पकड़ लिया गया और 8 जनवरी को इन्हें फाँसी दे दी गई। इससे यह स्पष्ट होता है कि अंग्रेज सरकार इनसे कितना डरती थी कि इन्हें दो दिन में ही फाँसी दे दी गई।

 टिकैट उमराव सिंह

ये खटंगा के 12 गाँवों के जमींदार थे और अपने भाई टिकैट घासी सिंह के साथ शेख भिखारी से मिलकर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े थे। टिकैट बंधुओं ने अंग्रेजों के खिलाफ लड़ाई में तलवारबाजी और जाँबाजी दोनों का भरपूर प्रदर्शन किया। टिकैट घासी सिंह को पकड़ लिया गया और उन्हें जेल में बंद कर दिया गया, जहाँ उनकी मृत्यु हो गई। जबकि उमराव सिंह को शेख भिखारी के साथ फाँसी दे दी गई।

नीलांबरपीतांबर

इन सगे वीर भाइयों ने पलामू में जन्म लिया और चेरो व खरवार जनजाति को इकट्ठा कर एक शक्तिशाली विद्रोही दल गठित कर लिया। सन् 1857 की क्रांति में इन्होंने पलामू क्षेत्र का नेतृत्व कर अंग्रेजों के छक्के छुड़ा दिए। छापामार युद्ध के विशेषज्ञ उन दोनों भाइयों को भी त्वरित दंड प्रक्रिया के तहत गिरफ्तारी के कुछ समय बाद ही फाँसी पर लटका दिया गया।

बीर तेलंगा खडिया

उनका जन्म गुमला जिला के सिसई थाना के अंतर्गत मुर्गु गाँव में 9 फरवरी  1806 को हुआ था। सरना धर्म के प्रति उनका अटूट प्रेम था। तेलंग खड़िया  ने 1831-32 के कोल विद्रोह को अपनी आँखों से देखा था। एक दिन तेलंगाखडिया सुबह सिसई स्थित अखाडे में अपने प्रशिक्षण देने के लिए पहुंचे। वहीं नजदीक की झाड़ी में हत्यारे बोधन सिंह ने मौका  मिलते ही तेलंगा पर गोली चला दी। इसी जगह तेलंगा खडिया की मौत हो गई।

जतरा भगत

गुमला जिले के विशुनपुर प्रखंड के चिंगारी नवाटोली में सन 1888 में जतरा भगत का जन्म एक गरीब उराँव परिवार में हुआ था। जतरा भगत ने अप्रैल 1914 में टाना भगत आन्दोलन प्रारंभ किया। सरकार ने जतरा भगत को उराँव जातियों को भड़काने के  आरोप में सन 1916 में बंदी बना लिया। उन्हें डेढ़ वर्ष की सजा दी गई। 1918 में जब जी आए, तब गांधीजी को टाना भगत से मिलवाया गया। टाना भगत ने सन 1921 में गया कांग्रेस अधिवेशन तथा 1927 ई. में साइमन कमीशन के खिलाफ अभियान में भी शरीक हुए।

 जयपाल सिंह

झारखंड पृथक् आंदोलन के नेता के रूप में जयपाल सिंह का नाम अमर है। इस प्रदेश के लोग इन्हें सर्वोच्च नेता (मरांग गोमाँग) के नाम से पुकारते हैं। वास्तव में झारखंड पृथक् आंदोलन के इतिहास में जयपाल सिंह की भूमिका अविस्मरणीय है। जनवरी 1939 ई. में छोटानागपुर के पृथक्तावादी आंदोलन के इतिहास में एक नए युग की शुरुआत हुई ‘छोटानागपुर आदिवासी महासभा’ ने अपने सर्वोच्च नेता जयपाल सिंह के नेतृत्व में असाधारण प्रगति की जयपाल सिंह का उपनाम या सिंग अर्थात् ‘सूर्य’।

1928 ई. के एम्सटर्डम ओलंपिक इन्हें भारतीय हॉकी नेतृत्व की जिम्मेदारी सौंपी गई। 23 मार्च, 1970 ई. में आदिवासियों के इस मरांग गोमाँग की मृत्यु हो गई। वे पहले ऐसे झारखंडी हैं, जिन्हें यह सर्वोच्च गौरव प्राप्त है।

इस प्रकार स्वतंत्रता संग्राम में दिए गए झारखंड के वीरों के योगदान को न तो कम करके ऑका जा सकता है और न ही भुलाया जा सकता है। इनके द्वारा किए गए विद्रोहों ने ही अंग्रेजों को झारखंड की जनजातियों के बारे में अपनी धारणा और नीतियाँ बदलने पर विवश कर दिया था। जिन्हें अंग्रेज असभ्य और अज्ञानी समझते थे, उन्होंने ही पूरे अंग्रेजी शासन को हिलाकर रख दिया था।

जंगल में निवास करनेवाली जनजातियों का जीवन पर्यावरण की दृष्टि से सदैव ही सुखमय और प्रसन्नचित्त रहा है। स्वच्छंद वातावरण और घनघोर हरियाली के बीच रसाल फल तथा पौष्टिक वनस्पतियाँ इनके सौष्ठव शरीर का कारण होती हैं। जंगल के जीवों के साथ मित्रवत् और आहारीय व्यवहार इनके मुखमंडल को सदैव आभायुक्त रखता है। परंपरागत शारीरिक व्यायाम से अपना मनोरंजन करने वाले बलिष्ठ आदिवासी प्रायः निर्भीक और साहसी होते हैं। स्वतंत्रता के साथ जीने वाले इन लोगों को अपनी परंपरा, पर्व एवं संस्कृति में किसी का हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होता और इसी कारण इन्हें लड़ाकू भी माना जाता है।

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