झारखंड का साहित्य व साहित्यकार

  • झारखंड के हिंदी साहित्य एवं साहित्यकार

झारखंड की मूल संस्कृति में भाषा, साहित्य, कला, चित्रकला, शिल्प, नृत्य-गान, नाट्य-कला, लोक कला आदि सभी अपनी विविधताओं के साथ उपस्थित हैं। क्षेत्रीय विविधता से ही इनमें यह विशेषता रही है। यद्यपि बाह्य संस्कृतियों के संपर्क में आने से इनमें कुछ मिश्रण या पृथक्करण हुआ है, लेकिन अभी भी यह कुछ क्षेत्रों में अक्षुण्ण देखी जा सकती है। भाषा के आधार पर देखा जाय तो राज्य में तीन मुख्य भाषा परिवार हैं, जिनमें भिन्न-भिन्न बोलियाँ हैं। इन भाषाओं के तीन मुख्य परिवार आर्य भाषा परिवार, ऑस्ट्रिक भाषा परिवार तथा द्रविड़ भाषा परिवार हैं।

आर्य भाषा परिवार से संबंधित साहित्य

नागपुरी साहित्य

  • नागपुरी भाषा के उद्भव से संबंधित विषय पर विद्वानों का अलग-अलग मत रहा है।
  • केसरी कुमार सिंह ने अपने आलेख ‘नागपुरी भाषा एवं साहित्य’ में मगही और मैथिली की तरह नागपुरी को भी मागधी अपभ्रंश से प्रसूत एक निश्चित भाषा कहा है।
  • डॉ. श्रवण कुमार गोस्वामी ने अपने शोध ‘नागपुरी शिष्ट साहित्य’ में नागपुरी को आर्यभाषा परिवार की ‘औरस संतान मानते हुए इसे अर्द्धमागधी अपभ्रंश से उत्पन माना है।
  • नागपुरी झारखंड के रांची, लोहरदगा, गुमला, सिमडेगा, सिंहभूम, लातेहार तथा छत्तीसगढ़ के जसपुर सरगुजा, एवं उडीसा के सुंदरगढ़, क्योंझर एवं बारीपदा जिलों में तथा असम के चाय बागानों में बोली जाती है।
  • नागपुरी लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत, लोक कथा, पहेली आदि साहित्य बहुत ही समृद्ध पाई जाती हैं। नागपुरी में ठेठ नागपुरी लोकगीत एवं बंगला मिश्रित नागपुरी गीत की प्रचुरता पाई जाती है।
  • नागपुरी लोक कथाओं की तुलना की जाय तो वेदों के आख्यान, जातक कथाएँ, कथासरितसागर, बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी, हितोपदेश, पंचतंत्र आदि कथाओं से मिलती-जुलती प्रतीत होती हैं।
  • नागपुरी शिष्ट साहित्य में गीत कविता कहानी, उपन्यास ,निबंध, संस्करण आदि सभी साहित्यक विधाओं का सृजन हुआ है।
  • नागपुरी के प्रथम कवि के रूप रघुनाथ नृपति को माना जाता है। प्रथम परंपरा के कवियों में रघुनाथ नृपति के अलावा हनुमान सिंह बरजुराम जय गोविंद, घासी राम, महंत घासी, कंचन आदि को माना जाता है। इनकी रचनाएँ सगुन भक्ति धारा से संबंधित है।
  • निर्गुण भक्ति परंपरा को सोबरन, महंत घासी, रूंगटु मलार, अर्जुन एवं मृत्यंजय नाथ शर्मा ने आगे बढ़ाया।
  • आधुनिक काल के कवियों में प्रफुल्ल कुमार राय, सहनी उपेंद्र पाल नहन, शिव अवतार चौधरी, लाल रणविजय नाथ शाहदेव, डॉ. बी.पी. केसरी, रामदयाल मुंडा, गिरधारी राम गोंझू गिरिराज प्रमुख हैं।
  • नागपुरी गद्य साहित्य का विकास 1900 ई. के आसपास ईसाई धर्म प्रचारकों द्वारा आरंभ माना जाता है।
  • ई.एच. हिटली ने 1896 ई. में नागपुरी का प्रथम व्याकरण ‘नोट्स ऑन दि गँवारी डायलेक्ट ऑफ लोहरदगा, छोटानागपुरो लिखा, जिसे नागपुरी में गद्य साहित्य का प्रारंभ माना जाता है।

खोरठा साहित्य

  • खोरठा भाषा के उद्भव एवं विकास के संबंध में ए.के. झा ने लिखा है कि यह भारत की प्राचीनतम लिपि ‘खरोष्ठी’ से संबंधित है। ‘खरोष्ठी’ शब्द ही अपभ्रंशित होकर क्रमश: खरोठ-खरोटी, खोरठा हो गई है।
  • यह झारखंड की एक प्रमुख आर्य भाषा परिवार से संबंधित भाषा है, जो मुख्य रूप से धनबाद, बोकारो, हजारीबाग, चतरा, गिरिडीह, कोडरमा आदि जिलों में बोली जाती है।
  • खोरठा भाषा का लोक साहित्य एवं शिष्ट साहित्य बहुत समृद्ध है। लोक साहित्य के अंतर्गत लोकगीत एवं लोक कथा की परंपरा प्रायः सभी क्षेत्रों में देखी जाती है। सोहरगीत, करम गीत, जीतिया गीत, टुसु गीत, फगुआ गीत आदि की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है खोरठा में राजा, मंत्री, राजकुमार, योद्धाओं आदि से संबंधित लोक कथाएँ प्रचलित हैं।
  • खोरठा शिष्ट साहित्य का आरंभ 1947 ई. के पूर्व से ही देखा जाता है। आजादी के पूर्व भुवनेश्वर दत्त शर्मा ने अनेक क्रांतिकारी रचनाएँ प्रकाशित की हैं। बरवा अड्डा धनबाद से श्री निवास से श्री निवास पानुरी द्वारा 1950 ई. के आसपास उनके खोरठा संकलनों का प्रकाशन ‘मेघदूत’ नाम से हुआ था।
  • इसके तुरंत बाद 1951 ई. में ‘तितकी’ नामक का प्रकाशन हुआ।
  • सन् 1954 में पानुरीजी की पुस्तक ‘दिव्य ज्योति’ एवं ‘बाल किरण’ का प्रकाशन हुआ है
  • 1988 में गजाधर महतो की पुस्तक ‘कहानी-संग्रह’ के रूप में पुटुस फूल’ प्रकाशित हुई।
  • 1985 में खोरठा ढांकी छेतर कमेटी, कोठार से ही ‘एक टोकी फूल’ का प्रकाशन किया गया।
  • 1980-90 के दशक में सेवाती और झिंगुर (सुकुमार), रूसल पुटस (शिवनाथ प्रमाणिक) एक पथिया डोंगल महुआ (संतोष कुमार महतो), बोनेक बोल (रमनिका गुप्ता), सोंधमाटी (विनोद कुमार) आदि पुस्तकों का प्रकाशन हुआ।
  • 1991 में धनपत महतो की पुस्तक ‘बिरसा भगवान्’ तथा ए.के. झा की पुस्तक ‘मेकामेकी ने मेटमाट’ छपी। सन् 1992 में ‘डाह नाटक’ सुकुमारजी की प्रकाशित हुई।
  • सन् 1992 में वंशीडाल की पुस्तक ‘डिंडाक डोआनी’ सन् 1993 में फूलचंद महतो की ‘भीसमेक सूत’ सन् 1995 में श्याम सुंदर की मुक्तिक डेहर, सन् 1996 में पानुरीजी की राम कथामृत छपी।
  • सन् 1997 में धनंजय प्रसाद के संपादन में एक नई खोरठा पत्रिका का प्रकाशन आरंभ हुआ। गिरधारी गोस्वामी के संपादन में सन् 1999 से लुआठी नामक पत्रिका का प्रकाशन बालीडीह से प्रारंभ हुआ।
  • अनिल कुमार गोस्वामी के संपादन में ‘सहिया’ नामक द्विमासिक पत्रिका आरंभ हुआ।
  • चितरंजन महतो द्वारा ‘जिनगिक टोह’ नामक उपन्यास की रचना की गई।
  • अन्य रचनाकारों में शांति भारत, भोगनाथ ओहदार, कमलेश सिंह, विनोद कुमार, भोलाराम ओहदार, लक्षमण महतो, डोमन साहु समीर आदि की रचनाएँ भी उल्लेखनीय हैं। 

पंचपरगनिया साहित्य

  • प्रोफेसर केसरी कुमार के अनुसार नागपुरी मागधी अपभ्रंश से प्रस्तुत एक निश्चित भाषा है। नागपुरी के एक विशिष्ट रूप को ही ‘पंचपरगनिया भाषा कहा जाता है। यह मुख्य रूप से पाँच परगना क्षेत्रों, यथा-बुङ, तमाड़ राहे, सोनाहात. सिल्ली क्षेत्रों में बोली जाती है।
  • पंचपरगनिया भाषा लोक साहित्य में मनुष्य के हर्ष-विषाद आशा-आकांक्षा के साथ मानव समाज की रीति-नीति, पर्व त्योहार, संस्कार-संस्कृति तथा परिवेश एवं प्रकृति का चित्रण मिलता है, जिसे लोकगीतों एवं लोक कथाओं के माध्यम से प्रस्तुत किया जाता है। लोकगीतों में झुमर, डमकच, खेमटा, डहरिया, टुसू, विवाह गीत आदि महत्त्वपूर्ण हैं।
  • पंचपरगनिया भाषा क्षेत्र में शिष्ट साहित्य का आरंभ विनंद या विनंदिया कवि से माना जा सकता है। ये कवि होने के साथ-साथ सिल्ली के राजा भी थे।
  • छोटानागपुर ताल मंजरी में विनंदिया के झमरों का संकलन किया गया है, जिसकी रचना उपेंद्र नाथ सिंह द्वारा किया गया है।
  • पंचपरगनिया के दूसरे महत्त्वपूर्ण कवि गौरीगिया या गौरांग सिंह या गौरचाँद को माना जाता है। इनके गीतों में बंगला भाव-भाषा का प्रभाव मिलता है।
  • पंचपरगनिया के कबीरपंथी धारा को उच्च स्थान दिलाने में कवि सोबरन का नाम आदर से लिया जाता है। नागपुरी के कवि बरजुराम की तरह पंचपरगनिया में भी बरजुराम नाम के एक कवि का महत्त्वपूर्ण स्थान है।
  • पाँचवे कवि के रूप में दीन या दीना को जाना जाता है। ये बाघमुंडी थाना जिला पुरूलिया के रहनेवाले थे। इनके गीत पंचपरगना क्षेत्रों में काफी प्रचलित हैं।
  • आधुनिक कवियों में ज्योतिलाल महादानी, रामकिष्टो, विपिन बिहारी, राजकिशोर सिंह, प्रेमानंद महतो, सृष्टिधर महतो, खगेन्द्र महतो, शक्तिधर अधिकारी, करमचंद अहीर, दुर्गा प्रसाद आदि के नाम उल्लेखनीय हैं, जिन्होंने पंचपरगनिया भाषा साहित्य के विकास में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई हैं।

कुरमाली साहित्य

  • मागधी अपभ्रंश से निकली हुई भाषा कुरमाली का विस्तार पंचपरगना क्षेत्र के अलावा संथाल परगना, बोकारो, धनबाद, दक्षिणी गिरिडीह, दक्षिणी हजारीबाग आदि क्षेत्रों में बोली जाती है। अन्य भाषाओं के लोक साहित्य की तरह करमाली लोक साहित्य के भी दो रूप होते हैं-गद्यरूप एवं पद्यरूप। गद्य साहित्य में लोक कथा, मुहावरा, लोकोक्तियाँ और पहेलियाँ होती हैं। पद्यरूप में लोकगीत एवं उसके विविध रूप होते हैं।
  • लोकगीतों में कुरमाली संस्कृति, रीति-रिवाज, विचारधारा, चिंतन पद्धति, कृषक जीवन, धर्म विश्वास, आनंद, वेदना तथा दार्शनिक भाव की अभिव्यक्ति दिखाई देती है।
  • कुरमाली लोकगीत अधिकतर प्रश्नोत्तर रूप में होते हैं। ये साहित्यक छंद विधान के नियम से मुक्त होते हैं। उधवा गीत, ढप गीत, डमकच, नटुआ, डॉइडधारा, जावा करम, डावका, बाँदना, कुंआरी आदि करमाली लोकगीत के प्रमुख रूप हैं।
  • कुरमाली लोक कथाएँ नागपुरी लोक कथाओं से मिलती-जुलती हैं। लोकनाट्य के रूप में कुरमाली क्षेत्र में छऊ नृत्य, नटुआ नृत्य, उमकच और माछानी को जाना जाता है।
  • मध्यकाल से कुरमाली साहित्य का शिष्ट साहित्य आरंभ होता है। इसका काल लगभग 14वीं सदी माना जाता है, जब चंडीदास की पुस्तक ‘करमालिक घंघर’ प्रकाशित हुई।
  • इसके बाद 18वीं सदी में ईसाई पादरी वेसहॉल मार्क द्वारा रचित कुरमाली भाषा की महान् पुस्तक प्रकाशित हुई थी। इस सदी में कुरमाली भाषा के मुख्य कवि विनंद सिंह गौरंगीय थे। इन्हें एकुरमाली का सूर कहा जाता है। विनंद सिंह गौरंगीय के गीत ‘आदि अमर संगीत’ नामक पुस्तक में संकलित हैं।
  • 18वीं एवं 19वीं सदी के प्रमुख कवियों में वरजुराम तांती, भवप्रीतानंद, दीनानाथ राय, शिरोमणी, रामकृष्ण, माली प्रमाणिक, पीतांबर, कृष्णचंद्र राउत, वृंदावन मुर्ख, अजमइत जुलाहा आदि प्रमुख थे।
  • 20वीं सदी के आरंभिक कवियों में कमला झरिया, चैतन्य कर्मकार, विपिन बिहारी मुखी, बरजुराम, भोलानाथ कालिंदी, शंकर बोधा, सृष्टिधर, महिपाल आदि प्रमुख हैं।

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